मन ही बादशाह

हमारा मन ही बादशाह है. मन को जब तक गुरु (परमात्मा) नही मिले तब तक वो शांत नही हो सकता. आज दिवाली के बाद पहला ही दिन है. अनन्य भक्त अनूप शुक्ल जी आज सुबह सुबह ही पधारे और तीन महिनों से आश्रम के सूना होने की चिंता जताई. तो सूनापन होना शुभ की निशानी है. हम सब कहीं ना कहीं इसी सूने पन की खोज में हैं पर मन उधर जाने नही देता. मन की बादशाहत जब तक बरकरार है तब तक सूनापन गहन मौन मे परवर्तित नही हो सकता. आज जब मौन टूटा ही है तो आईये इसे एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझने की कोशीश करें.

एक जंगल मे एक सूफ़ी फ़कीर रहता था. सूफ़ी फ़कीरों के बारे मे यह तो आप जानते ही होंगे कि उनका कोई कर्म ऐसा नही होता कि आप उनको पहचान सकें कि यह बाबा महात्मा है. फ़कीर अपना काम धंधा, गृहस्थी यानि सारी दुनिया दारी करता दिखाई देगा पर असल मे वो मर्म का जानकार होता है.

बादशाह एक बार जंगल में भटकता हुआ इस फ़कीर के झौपडे पर पहुंच गया और इस फ़कीर का मुरीद ब्बन गया. अब वो इस फ़कीर को अपने महल मे निमंत्रित करता और आत्मज्ञान प्राप्त करता.

एक दिन फ़कीर बोला - बादशाह..अब ये तो ठीक नही लगता कि कुंआ प्यासे के पास जाये? अब तो प्यासे को ही कुयें के पास आना होगा. अत: आपको जब मेरी जरुरत लगे..आप आजाना मेरे झौपडे पर, अब मैं आपके महल मे नही आ पाऊंगा.



बादशाह को भी कुछ चस्का लग चुका था सो कुछ ही दिनों बाद वह फ़कीर के झौपडे पर जा पहुंचा. वहां देखा की फ़कीर की पत्नि बाहर आंगन मे झाडू लगा रही है. बादशाह के आते ही उससे फ़कीर के बारे में पूछा. उस महिला ने बताया कि वो पास ही के खेत मे अपने पशुओं को चराने गया है. और उसने वहीं रखी एक टूटी सी कुर्सी बादशाह की तरफ़ खिसका दी और बोली - बादशाह सलामत..आप यहां बैठिये...मैं पानी लेकर आती हूं.

बादशाह ने बैठने से मना कर दिया, जब तक वो पानी का गिलास लेकर आचुकी थी. बादशाह ने पानी पीने से भी मना कर दिया और पूछने लगा कि वो कितनी देर में आयेंगे?

महिला ने सोचा कि बाद्शाह है..सो टूटी कुर्सी पर कैसे बैठेगा सो अपने झौपडे मे पडी खाट की तरफ़ इशारा करके बोली - बादशाह सलामत..आप अंदर बैठिए खाट पर...तब तक मैं उनको बुला लाती हूं. और अपने झौपडे में पडी खाट पर एक मैली सी चद्दर बिछाने लगी.

बादशाह बोला - नही नही...मैं बैठने नही आया हूं...आप तो उनको जाकर बुला लाईये तब तक मैं बाहर ही टहलता हुं.
महिला को बडा आश्चर्य हुआ और वो पने पति को बुलाने चली गई.

फ़कीर जहां भेड बकरियां चरा रहा था वहां पहुंच कर उसने सब बात बताई. और वापस लौटते समय उसने अपने पति को बताया कि बादशाह को मैने कुर्सी पर बैठने का कहा..पर उसने मना कर दिया...खाट पर बैठने का कहा..पर मना कर दिया...पानी पीने को कहा..पर मना कर दिया. ये बादशाह मुझे तो कुछ पागल सा लगता है?

फ़कीर बोला - नही, ये अकेले बादशाह का ही रोग नही है. सभी को यही और..और की बीमारी लगी है.

उस फ़कीर की पत्नि बोली - बात कुछ समझ मे नही आई?

फ़कीर बोला - ये सब मन के खेल हैं. असल मे ये मन ही बादशाह है. जैसे किसी के पास दूकान हो तो वो शोरूम बना लेना चाहता है...शोरूम वाला सारी दुनियां मे अपनी चैन बना लेना चाहता है. यानि और..और..और की चाह निरंतर लगी रहती है. ऐसे ही ये बादशाह (मन) मुझ गुरु (परमात्मा) से मिलने आया है तो ये तेरे मैले कुचेले झौपंडे
की टूटी कुर्सी और खाट पर कैसे बैठेगा? ये तो बादशाह है..ऊंचे सपने देखेगा ही...और देखना ये जैसे ही मुझ (परमात्मा) से मिलेगा ..इसे कुछ बैठने का होश ही नही रहेगा. यानि सर्वश्रेष्ठ पा लेने तक मन रुपी बादशाह दौडता ही रहता है.


मग्गा बाबा का प्रणाम!

15 comments:

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

18 October 2009 at 12:01

सुंदर कथा।

  vinay

18 October 2009 at 12:01

हाँ गुरू के बिना मन ही तो बादशाह ।

  राज भाटिय़ा

18 October 2009 at 15:23

राम राम जी की, बहुत सुंदर कथा कही महाराज.

  काजल कुमार Kajal Kumar

18 October 2009 at 18:01

फकीरन की मौज निराली.

  premlatapandey

18 October 2009 at 20:44

यह चिट्ठा! इतना अच्छा और मैं पहली बार यहाँ पहुँची हूँ! पर अब हमेशा आऊंगी।
एक निवेदन-
कृपया इसे नियमित लिखें यह तो बहुत ज़रुरी है।

  Mishra Pankaj

19 October 2009 at 07:24

आपका ये ब्लॉग बहुत आध्यात्मिक है

  सतीश सक्सेना

19 October 2009 at 09:13

आशा है अब यह आश्रम चलता रहेगा ! अनूप जी को धन्यवाद !

  अनूप शुक्ल

19 October 2009 at 10:56

जय हो मग्गा बाबा की!

  वन्दना

19 October 2009 at 12:42

bilkul sahi farmaya aapne.......man se bada badshah aur kaun hai ......ye to natni ki tarah nach nachata hai agar iske ghodon ko vash mein kar liya jaye to parmatma door kahan hai wo to andar hi samaya hai bas isi ki chanchalta ki wajah se samne nhi aata ya kaho khud ko prapt nhi kiya ja sakta jab tak man vash mein na ho............bahut hi sarthak lekh likha hai.

  अभिषेक ओझा

19 October 2009 at 15:18

जय हो बाबा की. आश्रम में कार्यक्रम चलते रहने चाहिए. बहुत दिनों से कई भक्त निराश लौट रहे थे !

  neelima sukhija arora

20 October 2009 at 18:50

बहुत ही बढिया बात कही है फकीर ने

  Ratan Singh Shekhawat

14 November 2009 at 10:18

अनुकरणीय दृष्टान्त

  कुमार संभव

20 April 2010 at 13:03

बाबा की कुटिया में पहली बार आया मजा आगया. ताऊ तू सी ग्रेट हो ..... अगले पोस्ट के इंतज़ार में तेरा भक्त

  Naveen Mani Tripathi

1 November 2012 at 21:34

Tau ji bahut hi sundar post ke liye sadar abhar

  Dr.NISHA MAHARANA

20 May 2013 at 20:02

waah bahut badhiya ....

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