रामकृष्ण परमहंस ज्यादा पढे लिखे नही थे. शायद कच्ची पहली पास या दुसरी फ़ेल. वहीं पर केशवचंद्र जी प्रकांड विद्वान और तर्क के जादूगर. और तार्किक स्वभावत: नास्तिक होता है तो वो भी थे.
रामकृष्ण जी का जितना अडिग विश्वास परमात्मा की सत्ता मे था उतना ही केशवचंद्र जी उसको डिगाने की कोशीश किया करत्ते थे. एक रोज तय होगया कि
अगले दिन सुबह ही दोनों के बीच शाश्त्रार्थ होगा और रामकृषण जी भी तैयार..स्वभावत: सरल थे सो तैयार होगये.
अगले दिन सुबह..खचाखच भरी भीड मे केशवचंद्र जी ने वो तर्क दिये कि सबको आनंद आगया. उन्होने ईश्वर के नही होने के इतने ठोस तर्क दिये कि लोग तालियां बजा ऊठे. स्वयम परम्हंस भी बच्चों की तरह तालियां बजाते रहे.
जैसे जैसे तर्क यह प्रतिपादित करता गया कि ईश्वर नही है वैसे वैसे भीड की तालियां बढती गई और केशवचंद्र जी भी खुशी से मन ही मन फ़ूले जारहे थे. पर यह क्या? परमहंस भी भीड के साथ साथ उनके समर्थन मे तालियां बजा रहे थे और अब तो वाह..वाह..भी कार्ने लगे. जब केशवचंद्र के सब तर्क खत्म होगये तब बारी आई परमहंस के तर्क देने की. यानि अब उनको सिद्ध करना था कि ईश्वर है.
अब केशव परमहंस को हंसता देखकर बोले - आप हार रहे हो यह जानकर भी आप हंसे जा रहे हो? आप कैसे सिद्ध करेंगे? आप तो तालियां बजा बजा कर स्वयम ही मेरा समर्थन करते जारहे हो?
परमहंस बोले - केशव, अब मुझे हराने का कोई उपाय तुम्हारे पास नही है. अगर अंधे को कहो कि दिये मे रोशनी नही होती तो वो मान ही लेगा, उसको कोई
अडचन ही नही है. पर जिसने अपनी आंखों से दिया देखा हो, उसको तुम कैसे समझावोगे कि दिये मे रोशनी नही होती?
इस बात पर केशवचंद्र बडॆ नाराज हुये. वो बोले - अब तो हद होगई. आप अगर मेरी बात से सहमत नही थे तो इतना खुश होकर तालियां बजाने की क्या जरुरत थी?
परमहंस बोले - वो इसलिये कि तुमने इतने अकाट्य तर्क दिये. इतनी प्रखर बुद्धि के मनुष्य को सिवाये परमात्मा के कोई बना भी नही सकता. तुम्हारे तर्क सुनकर तो मुझे परमात्मा पर और भी ज्यादा यकीन होगया.
बाद मे केशवचंद्र ने अपनी आत्मकथा मे लिखवाया कि मैं जीवन मे सिर्फ़ एक बार ऐसे आदमी हारा हूं जिसने मेरे विरुद्ध एक भी बात नही कही.
मग्गाबाबा का प्रणाम
अपना और तर्क
Monday, 29 June 2009 at Monday, June 29, 2009 Posted by मग्गा बाबा
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31 comments:
29 June 2009 23:27
बहुत बढिया कथा।आभार।
30 June 2009 02:25
ऐसे प्रकांड पंडित को बस ऐसा एक सरल महात्मा ही हरा सकता है.
30 June 2009 16:49
वाह क्या बात है, बहुत सुंदर
30 June 2009 17:46
वाह ! बहुत अच्छा प्रसंग !
1 July 2009 15:48
Vakai prerak prasang.
4 July 2009 22:46
यह तर्क नहीं श्रद्घा है.
7 July 2009 10:33
बहुत सुन्दर कथा से अवगत कराया मग्गा बाबा की जय!!!
9 July 2009 20:23
बहुत सार्थक कथा बधाई
10 July 2009 23:52
Life is larger than Logic.
तर्क की सीमा है, श्रद्धा अनंत है.
15 July 2009 19:35
bahut prerak..
16 July 2009 12:31
वाह्! अति सुन्दर एवं प्रेरक प्रसंग सुनाया आपने...
सच है कि श्रद्धा को तर्कों में नहीं बाँधा जा सकता!
27 July 2009 16:50
बहुत बडिया कथा अभी कुछ दिन पहले किसी और ब्लोग पर भी पढी आभार्
30 July 2009 22:44
Bada sundar prerak prasang...achha laga.
"युवा" ब्लॉग पर आपका स्वागत है.
1 August 2009 21:51
आस्था व विश्वास तर्क से उपर हैं.
7 August 2009 10:39
Shukriya yeh amulya vachan baantne ke liye !! Yun hi likhte rahe !!
15 August 2009 12:30
Nice one.
स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं.
स्वतंत्रता रूपी हमारी क्रान्ति करवटें लेती हुयी लोकचेतना की उत्ताल तरंगों से आप्लावित है।....देखें "शब्द-शिखर" पर !!
21 August 2009 16:19
धन्यवाद, आपका लिखने तरीका इतना स्पष्ट है की मन में कोई संसय नहीं रहता. पहली बार देखा, पढ़ा और जमा किया. धन्यवाद
21 August 2009 16:20
धन्यवाद, आपका लिखने तरीका इतना स्पष्ट है की मन में कोई संसय नहीं रहता. पहली बार देखा, पढ़ा और जमा किया. धन्यवाद
29 August 2009 22:53
baDhiya
5 September 2009 10:20
कथा बहुत सार्गर्भित है कुछ दिन पकले भी किसी ब्लाग पर पढी थी आभार्
11 September 2009 17:24
बहुत बडिया धन्यवाद
16 September 2009 16:22
प्रेरक कथा है
28 September 2009 10:17
बहुत बढ़िया लगा! अत्यन्त सुंदर! विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें!
28 September 2009 21:00
परमात्मा पर तो अखंड विश्वास हमें भी है, इतनी सुंदर व जटिल सृष्टि का सृजन मानव के बस का तो नही था। फ़िर भी मानव स्वयं को सर्वेसर्वा कहलवाने से बाज नही आता।
आपको भी दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।
29 September 2009 08:21
bahut achchhi post hai
30 September 2009 09:34
सराहनीय कहानी है बधाई!!
30 September 2009 15:14
बाद मे केशवचंद्र ने अपनी आत्मकथा मे लिखवाया कि मैं जीवन मे सिर्फ़ एक बार ऐसे आदमी हारा हूं जिसने मेरे विरुद्ध एक भी बात नही कही.
baat jandar hai...
ram... raam....sa..
1 October 2009 12:24
ek chutkula suna tha
ek viyakti 2+2 paanch kahta tha. Dusre ne shart lagai ki bhai 2+2= 4 hote hain. shart ke liye din tay hua.
kisi ne pahle viyakti ko samjhaya bahi tum shart haar jaaoge 2+2 = 4 hi hota hai.
Usne kaha shart to tab haroonge jab mai manoonga ki 2+2=4 hote hain.
Ishwar hai ya nahin yeh koi bahas ka mudda hai hi nahin. koi mahsoos kare ya na kare. yeh depend karta hai par lekh bahut badiya hai, Dhanyawaad
3 October 2009 12:59
बहुत सुन्दर !!!!!!!
5 October 2009 16:12
namaskar
itni acchi saarthak aur gyaanwardhak katha ke liye main aapka aabhari hoon ..
raamkrishn ji ki jeevankatha se kitna kuch seekha ja sakta hai ..
bahut badhai
regards,
vijay
pls read my 100th post .
www.poemsofvijay.blogspot.com
18 October 2009 09:07
तीन महीने से आश्रम सूना है। जय हो।
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