सागर तट की लहर से बातचीत

सागर का किनारा बडे असंमजस में था. वो रोज सोचता था कि ये लहर बहन ऐसा क्युं करती है? पर शिष्टाचार वश चुप रह जाता था.waves-kinara

आज उससे रहा नही गया और लहर के आते ही पूछ बैठा – बहन, मुझे एक बात समझ नही आती की तुम आती हो और तुरंत लौट जाती हो? आखिर बात क्या है? जो तुम हमेशा इतनी हडबडी मे रहती हो? अरे अब आई हो भाई के पास..तो दो  घडी बैठो..कुछ अपनी सुनाओ..कुछ मेरी सुनो.

लहर बोली – भैया आप बात तो सही कह रहे हो.  पर अगर मैं ठहर गई तो मेरा जीवन ही समाप्त हो जायेगा. इसलिये यह जरुरी है कि आने जाने का क्रम सुचारु रुप से चलता रहे.  गति ही मेरा जीवन है और जिस पल ठहर गई..उसी पल मेरी मृत्यु है.

लहर आगे बोलने लगी – भैया आप देखो ना, जब तक पानी अपनी धारा मे बहता रहता है उसको स्वच्छ नीर के नाम से बुलाया जाता है. और जहां उसका बहना बंद हुआ कि वो बदबू मारने लग जाता है.

इस सागर तट और लहर की बातचीत से यही लगता है कि जीवन प्रवाहमान होना चाहिये.  इस संसार मे ग्रह नक्षत्र नदियां सभी कुछ तो प्रवाहमान है. जहां इनकी गति रुकी की सब कुछ खत्म.

हमारे जीवन मे भी दुख सुख के रोडे आते ही रहते हैं पर इनसे घबराये बिना हमको जीवन पथ पर अबाध गति से आगे बढते रहना चाहिये.

मग्गा बाबा का प्रणाम.

सोने और जागने में कुछ फ़र्क नही…

जीवन हमेशा से ऐसा ही रहा है ! अगर हम ये सोचे कि पिछले युग मे ऐसा था और अब ऐसा है ! नही सब कुछ वैसा का वैसा ही है ! भक्त पहले भी ऐसा ही था और आज भी वैसा ही है !

 

क्या फ़र्क है ? सिर्फ़ समझ का !

असल मे भक्त को ये पता ही नही रहता कि कब उसकी जवानी आई ? कब चली गई ? कब बुढापा आया ? कब चला गया ?


कब जिन्दगी आई ? कब मौत आई ? कुछ पता ही नही चलता ! उसके अन्दर तो एक ही धुन रहती है ! एक इकतारा बजता ही रहता है उस परम प्यारे प्रभु के प्रेम का ! जीवन से मिले तो जीवन, मौत से मिले तो मौत , सुख से मिले तो सुख, दुख से मिले तो दुख !


उसका अपना तो कोई चुनाव ही नही रह जाता ! रोम रोम से राम ! उसका अपना कुछ भी नही है ! मान बडाई से कुछ ज्यादा लेना देना नही रहा ! लोक लाज भी गई !

 

राज रानी मीरा , नाचने लगी सडकों पर ! मेवाड की महारानी , कभी घुन्घट से बाहर भी ना झान्का होगा ! पर अब चिन्ता नही रही ! रख दिया सर उसके चरणों मे ! चिन्ता करे तो वो करे ! गुरु मिल्या रैदास जी ! उड़ गई नींद ! भक्त को नींद भी कहां ?

मैने एक वाकया पढा था स्वामी राम तीर्थ जी के बारे मे ! और वो यहां प्रासन्गिक होगा ! ये किस्सा है स्वामी जी के अमेरिका से वापस लौटने के बाद का ! सरदार पुरण सिंह जी उनके बडे भक्त थे ! सो कुछ दिन वो हिमालय मे स्वामी जी के साथ जाकर रहे !


दूर जंगल मे, बिल्कुल सुन्सान मे है ये बंगला ! रात को कोई आता जाता भी नही ! कमरे मे दोनो ही सोये हुये हैं ! आज से पहले की रात तक तो सरदार साहब स्वामी जी से पहले ही निद्रा के आगोश
मे चले जाते थे ! पर आज किसी कारण उनको नींद नही आ रही थी ! वो जग ही रहे थे !


कमरे मे उन दोनो के अलावा कोई नही है ! सरदार जी को राम राम की राम धुन सुनाई पडने लगी ! उनको कुछ समझ नही आया ! वो उठ कर बाहर गये औए बरामदे मे चक्कर लगा कर आये ! बाहर आवाजें कुछ कम हो गई !

 

फ़िर वापस कमरे मे लौट कर आये तो आवाजें फ़िर तेज हो गई ! उनको थोडा आश्चर्य हुवा ! फ़िर स्वामी रामतीर्थ जी के पास जाकर देखा तो आवाजें और तेज होती गई ! बिल्कुल नजदीक गये तो स्वामीजी
गहरी नींद मे सोये पडे हैं ! फ़िर ये आवाजें कहां से आ रही हैं ?


उन्होने सर, पांव, हाथ सबके पास नजदीक से सुना तो स्वामी जी के रोम रोम से राम नाम की आवाज आ रही थी ! नींद मे भी उनका रौआं रौआं राम नाम का जाप कर रहा था !

और आप चकित मत होना ! ये वैसे ही होता है जैसे २४ घन्टे गालियां बकने वाला नींद मे भी गालियां ही देता रहता है ! ऐसे ही २४ घंटे प्रभु स्मरण करने वाला व्यक्ती नींद मे भी राम का सुमरण ही करेगा !

 

अपने कार्य को करते हुये जिसने अपने को अलग कर लिया वो इस जगत मे रह कर भी इस जगत मे ना रहा ! उसके लिये जीना और मरना कोई क्रिया नही रही ! वो तो बस है।  इस सन्सार मे है भी और नही भी है !


मग्गा बाबा का प्रणाम !

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