बोधिधर्म और सम्राट वू

 

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बोधिध्रर्म एक फ़कीर. चीन गया. चीन का सम्राट वू. महान सम्राट ने उसे राजमहल मे ठहरने का आमंत्रण दिया पर बोधिधर्म तो अपने आप मे रमने वाला फ़कीर था. उसे राजमहलों से क्या लेना देना?

 

गांव से बाहर एक पहाडी पर कोई छोटा सा मंदिर जैसा कुछ था. बस वहीं ठहरा था, बोधिधर्म थोडा सनकी टाईप का भी था. उसका कुछ भरोसा नही कब क्या कर बैठे? एक बडा सा लठ्ठ यानि डंडा साथ रखता था.

 

सम्राट वू एक दिन बोधिधर्म के पास पहुंचा और बोला - फ़कीर साहब, क्या बताऊं ? मेरा मन यानि "मैं" कभी शांत ही नही होता. इतना बडा साम्राज्य खडा कर लिया फ़िर मन चैन नही लेने देता.

 

बोधिधर्म बोला - सम्राट क्या कहा आपने? आपका मन शांत नही होता? अरे इसमे कौन सी बडी बात है? आप तो एक काम करना कि आज रात को तीन बजे आजाना. और अपने साथ मे कोई सिपाही वगैरह मत लाना. बिल्कुल अकेले आना. एकदम शांत कर दूंगा आपके मन को . मेरे पास मन को शांत करने की बडी अचूक दवाई है.

 

और अब सम्राट वहां से विदा हुआ पांच दस सीढियां चल कर उतर ही रहा था कि बोधिधर्म ने पीछे से आवाज दी कि सम्राट आपके उस मैं यानि मन भी को साथ लेते आना. क्योंकि शांत तो "मैं" को ही करना है ना.

 

अब सम्राट राजमहल मे आगया. और सोचने लगा कि जाये या नही जाये? Bodhisattva (1)

क्योंकि उसने  अकेले बुलाया है. सैनिकों के साथ बिना राजा का जाना भी

ठीक नही. और फ़िर बोधिधर्म तो बिल्कुल ही पागल है. क्या पता सर मे लठ्ठ वठ्ठ मार दे. कहीं किसी दुश्मन को पकडवा दे.

 

राजा के मन मे अनगिनत विचार आते रहे. पर मन मे फ़ांस लगी थी, सो मरता क्या ना करता? अपने आप अकेला रात को तीन बजे पहुंच गया बोधिधर्म की कुटिया पर.

 

जैसे ही वहां पहुंचा तो देखा कि बोधिधर्म लठ्ठ लिये बैठा है और उसी का इन्तजार कर रहा है. बोधिधर्म बोला - आओ सम्राट आओ. मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था. अब बताओ कहां है तुम्हारा मैं? जल्दी बताओ. बस एक लठ्ठ मारा तुम्हारे "मैं" को कि वो शांत हुआ. तुम साथ मे लाये तो हो ना अपने मैं को? कहीं दिखाई नही दे रहा है ?

 

अब सम्राट तो घबडाया. सोचा कि ये पागल आदमी दिखता है. मैने अकेले आकर गल्ती कर दी. और अब ये लठ्ठ जरुर मार देगा. सम्राट पछताने लगा कि आज आअदमी पहचानने मे भूल कर दी उसने.

 

बोधिधर्म बोला - सम्राट, अब तुम बताओ कि तुम्हारा मैं किधर है? तो मैं उसका इलाज शुरु करुं. जल्दी बताओ, रात भी ज्यादा हो गई है. फ़िर तुमको भी राजमहल लौटना होगा.

 

सम्राट वू हिम्मत करके बोला - महाराज आप बहुत उटपटांग सवाल पूछ रहे हो? अरे मेरा मैं कोई बाहर घूमता है क्या? जो मैं ऊठाकर आपके हवाले कर दूं? मेरा मैं तो मेरे अंदर है अब कैसे बताऊं?

 

पर बोधिधर्म तो पक्का गुरु है. हाथ आये को छोड कैसे सकता है? बोला - ठीक है. तेरे अंदर है तो उसको हम अंदर से पकड कर ही ठीक कर देंगें. बस आप तो एक काम करिये कि आंख बंद कर लिजिये, और अपने अंदर देखिये. फ़िर आपको जहां पर भी अपने शरीर मे अपना मैं दिखाई पडे मुझे फ़ोरन बताईये. मैं तुरंत उसको दो लठ्ठ मार कर शांत कर दूंगा.

 

सम्राट ने डर कर आंख बंद कर ली. और सोचने लगा कि इसको जिस तरफ़ भी इशारा किया कि यहां पर मेरा मैं है, यानि ये कहा कि मेरा मैं हाथ मे है...पैर मे है..या छाती मे है..तो ये वहीं पर लठ्ठ मारेगा और कभी कह दिया कि दिमाग मे है तो ये खोपडे पर लठ्ठ मार कर तोड डालेगा.. बोधिधर्म वैसे भी काफ़ी सनकी कुख्यात फ़कीर था. सम्राट तो फ़ंस ही गया आज..

 

धीरे २ डर के मारे जो आंखे बंद की थी..अब अपने मैं को ढुंढने लगा..हाथ पांव सर,,,दिमाग...जहां भी अपने मैं को ढुंढता..वहीं वहीं पर जवाब मिलता कि..नही ये मैं नही हूं.

बाहर बोधिधर्म लठ्ठ लिये नजदीक बैठा है, कि कब ये कहे कि ये रहा मेरा मैं और मार दे लठ्ठ उस पर.

 

सूबह की किरणें फ़ूट रही हैं...बोधिधर्म ने पूछा -- सम्राट बहुत देर होगई.. अभी तक आपका  मैं आपको मिला की नही..मैं कब से इंतजार कर रहा हूं..उधर सम्राट वू...ध्यान मे मगन  डूबा हुआ है..मैं खो गया.. कहीं मैं नही.. सारे शरीर मे खोज लिया..पर नहीं मिला मैं..अंत मे खुद ही खो गया...बस ध्यान की मस्ती में उतर गया..लगा गया गोता.

 

सम्राट ने धीरे से आंखें खोली और बोधिधर्न के पावों मे गिर पडा - बोला महाराज ..बस मैं मेरे अंदर कहीं भी नही मिला...सब जगह खोज लिया..पर अब मैं बैचेन नही हूं. शान्त हुं.

 

बोधिधर्म बोला - परमात्मा इतना ही सरल है..ध्यान इतना ही सरल है..पर हम उसे टेढा बना देते हैं ..ध्यान की हर सीढी इसी तरह से शुरु होती है.

 

मग्गाबाबा के प्रणाम.

4 comments:

  विनय

3 February 2009 at 20:56

आप सादर आमंत्रित हैं, आनन्द बक्षी की गीत जीवनी का दूसरा भाग पढ़ें और अपनी राय दें!
दूसरा भाग | पहला भाग

  राज भाटिय़ा

3 February 2009 at 22:45

बहुत सुंदर लग बाबा जी आप का संदेश,
धन्यवाद

  अभिषेक ओझा

4 February 2009 at 15:08

जय हो मग्गा बाबा ! जिसने 'मैं कौन हूँ' जान लिया उसके लिए फिर बचा ही क्या !

  ilesh

9 February 2009 at 13:44

सुंदर...अच्छा लगा पढ़ना....

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