हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कई लोगो के मत मे कमाली कबीर साहब की बेटी थी ! पर कबीर पन्थी मानते हैं कि कबीर ने कभी शादी ही नही की ! और यह कमाली बाद्शाह की बेटी थी ! जिसको सांप ने काट खाया था और कबीर साहब ने उसको मृत से जिवित कर दिया था ! उसके बाद स्नेहवश वो कबीर साहब को ही जीवन दाता यानी पिता मान कर शादी होने तक उनके साथ ही रही थी ! और बाद मे शादी कि उम्र होने पर कबीर साहब के कहने पर वो शादी के लिये तैयार हो गई थी ! एवन उसकी शादी मुलतान के शाही खानदान मे हुई थी ! हमारा उदेष्य किसी भी तरह किसी भी भाई कि भावनाओ को चोट पहुंचाना नही है !
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गोरखनाथ जी को एक दिवस इच्छा हो गई कि कबीर साहब से मिला जाये !
कबीर साहब उस समय मे एक ऐसे संत हुये की उनके पास हिन्दू मुसलमान
कोई भी हो ! सब समान भाव उनमे रखते थे ! और ऐसा ही उस समय के
संत समाज मे भी उनसे हर पंथ , हर सम्प्रदाय का महात्मा उनसे भेंट
करके प्रशन्न होता था ! इनके बारे विस्तृत चर्चा फ़िर कभी करेंगे !
अभी हम इस कहानी को आगे बढायेंगे ! अपने प्रोग्राम अनुसार गोरख कबीर
साहब के पास पहुंच गये !
कबीर ने उनका बडा आदर सत्कार किया और दोनो महात्माओं मे सत्सन्ग चर्चा
चलती रही ! इतनी देर मे कमाली जो कि कबीर की बेटी थी वो आ गई ! और कबीर
साहब से बोली - मैं तैयार हूं ! अब चले !
कबीर साहब ने कमाली का परिचय गोरख से करवाया और कमाली उनको प्रणाम
करके बैठ गई ! गोरखनाथ जी ने पुछा कि आपका कहां जाने का प्रोग्राम था ?
तब कबीर साहब ने बताया कि हम संत रैदास जी के पास मिलने जाने वाले थे !
और कबीर साहब यह तो कह नही पाये कि अब आप आगये तो नही जायेंगे , क्योंकी
उनका जाना जरुरी था ! अब कबीर साहब बोले - गोरखनाथ जी आप भी हमारे साथ
चलें तो बडा अच्छा हो ! रैदास जी बहुत पहुंचे हुये महात्मा हैं !
अब गोरख ठहरे कुलीन नाथ पंथ के महान सिद्ध योगी ! वो भला मिलने जाये और
वो भी रैदास से ? ये भी कोई बात हुई ? अरे गोरख के तो उनको दर्शन भी नही हों !
और ये कबीर साहब का दिमाग कुछ चल गया जो हमसे कह रहे हैं कि रैदास से
मिलने चलो ! उनकी क्या जात है ? हम अच्छी तरह से जानते हैं ! पर कबीर साहब
ने जब जोर देकर कहा तो गोरख मना नही कर सके ! और तीनों पहुंच गये रैदास के
घर पर ! वहां पहुंचते ही रैदास तो बिल्कुल भाव विह्वल हो कर पगला से गये !
साक्षात कबीर, जिसको वो परमात्मा ही मानते थे ! वो उनके घर आया है ? और साथ
मे गोरखनाथ जी , ये वो गोरख जिनका आने का तो सपने मे भी रैदास नही सोच
सकते थे ! आज साक्षात उनके सामने और उनके घर पर आ गये हैं ! क्योंकी कई बार
रैदास ने कबीर को कहा भी था कि एक बार मुझे गोरख नाथ जी के दर्शन करवा दो !
और आज तो उनकी समस्त इच्छाए पुरी हो रही थी !
जब ये तीनों लोग वहां पहुंचे थे तब रैदास जी अपने नित्य कर्म अनुसार जुते सी रहे थे !
और इनके पहुंचते ही उसी अवस्था मे उठ्कर अन्दर गये ! वापसी मे उनके हाथ मे दो गिलास
पानी या शर्बत के थे ! उन्होने उसी अवस्था मे एक गिलास कबीर की तरफ़ बढाया ! कबीर
ने वह गिलास तुरन्त गटागट पी लिया ! और दुसरे गिलास को उन्होने गोरखनाथ जी की तरफ़
बढाया ! गोरख बोले - नही नही , मुझे प्यास नही है ! मैं अभी २ रास्ते मे पी कर ही
आया हुं ! जैसे हम लोग किसी को चाय के लिये मना करते हैं उसी अन्दाज मे उन्होने पानी
पीने से मना कर दिया ! रैदास जी ने बहुत आग्रह किया ! पर गोरख ने मना कर दिया !
और अब वही गिलास रैदास जी ने कमाली की तरफ़ बढा दिया ! कमाली ने भी पीकर खाली
कर दिया ! असल मे गोरख बहुत बडे सिद्ध योगी थे और वो नाथ पन्थ के महान योगी थे !
उनके मन मे यह बात आ गई कि ये सीधा साधा चर्मकार, और अभी चमडा सीये हुये
हाथों से पानी ले आया ! मैं इसके इन हाथो से पानी कैसे पिऊं ? और वैसे भी नाथ पंथ
मे उस समय ये अभिजात्यपन था ! यानी कि हम श्रेष्ठ ! खैर साहब अब थोडा बहुत जो भी
सत्सन्ग हुआ और फ़िर सब विदा होकर अपने २ ठिकाने पहुंच गये ! अब इस घटना के बहुत बाद
की बात है !
एक रोज गोरख आकाश मार्ग से जा रहे थे ! नीचे से उन्हे एक महिला की आवाज आई-
आदेश गुरुजी .. आदेश गुरुजी .. ( यह नाथ पंथ मे प्रणाम करने का शब्द है ) !
गुरु गोरख नाथ चौंके ? यह कौन है जो मुझे इस तरह देख पा रहा है ! और वो भी
एक औरत ? उन्हे बडा आश्चर्य हुवा ! गुरु गोरखनाथ जी इतने महान सिद्ध थे कि वो
अपनी मर्जी से आकाश मे विचरते थे और वो भी अद्रष्य होकर ! उनको इतनी सिद्धियां
प्राप्त थी कि उनके लिये कुछ भी असम्भव नही था ! इस घटना के समय वो मुल्तान
(अब पाकिस्तान मे ) के उपर से जा रहे थे !
गोरख नीचे आये और उन्होने उस औरत से पुछा कि - तुमने मुझे देखा कैसे ! मुझे अदृष्य
होने के बाद कोई भी नही देख सकता ! ये हुनर या सिद्धि तो नाथ पन्थ मे भी किसी के
पास नही है ! फ़िर तू कौन ?
वो औरत बोली - गुरुजी मैं तो आपको जब भी आप इधर से गुजरते हैं ! तब हमेशा ही
देखती हूं ! और हमेशा आपको प्रणाम करती हुं ! पर आप बहुत तेजी से जा रहे होते हैं !
आज आप कम ऊंचाई पर थे तो आपको मेरी प्रणाम सुनाई दे गई ! आप तो मेरे घर चलिये !
और मेरा आतिथ्य गृहण किजिये !
अब तो गोरख और भी चक्कर खा गये कि अब ये कौन मुझसे बडा सिद्ध पैदा हो गया ?
ये सिद्धि तो मेरे पास भी नही है कि मैं किसी अदृय्ष्य चिइज को देख सकूं ! उन्होने सोच
लिया कि ये महिला भी कुछ सिद्धि जरुर रखती है ! और आप अपने से छोटे मे तो इन्ट्रेस्ट
नही लेते पर बडे को आप यूं ही इग्नोर भी नही करते ! गोरख ने पूछा - माते आपका
परिचय दिजिये ! मैं अधीर हो रहा हूं ! वो औरत बोली - गुरुजी आप मुझे नही पहचाने ?
अरे मैं कमाली ! याद करिये ! आप हमारे घर आये थे ! कबीर साहब के यहां !
तब गोरख को याद पडा कि हां - ये सही कह रही है ! तब उन्होने पूछा - तुझको यह
अदृष्य वस्तुयें कब से दिखाई देती हैं और ये सिद्धि तुमको किसने दी ?
कमाली बोली - गुरुजी , मेरे को कोई सिद्धि विद्धि नही दी किसीने ! बस मुझे तो दिखाई
देता है ! अब गोरख ने सोचा की शायद कबीर ये सिद्धि जानते होंगे और उन्होने ही
इसे ये सिद्धि दी होगी !
अब उन्होने पूछा कि कब से यह वस्तुएं दिखाई दे रही हैं ?
कमाली बोली - आपको याद होगा कि आप और कबीर साहब के साथ मैं भी रैदास जी
के यहां गई थी और उन्होने एक पानी का गिलास आपको दिया था ! और आपने वो
पानी पीने से इनकार कर दिया था ! और वो गिलास रैदास जी ने मुझे दे दिया था !
बस तब्से ही मुझे सब अदृष्य चीजे दिखाई देती हैं ! भूत प्रेत, जलचर, नभचर
सब कुछ दिखाई देते हैं ! मैं शादी के बाद यहां मुल्तान आ गई ! क्योन्की मेरी
शादी यहां मुलतान मे हुई है ! और आपको तो मैं अक्सर ही देखती हूं !
जब भी आप इधर से आकाश मार्ग से गमन करते हैं ! अब गोरख नाथ के आश्चर्य
का ठिकाना नही रहा ! उनको अब वो रहस्य समझ आया कि क्यूं कबीर उनको रैदास
के यहां ले गये थे और क्युं रैदास ने उनको इतना आग्रह किया था !
अब यहां से विदा होकर गोरख तुरन्त कबीर के पास गये और उनसे आग्रह किया कि
वो अब रैदास जी के यहां उनको अभी ले चले ! और कबीर तुरन्त ही उनको लेकर
रैदास के पास गये ! रैदास जी ने उनको बैठाया और सत्सन्ग की बाते शुरु करदी !
अब गोरख का मन सत्सन्ग मे क्या लगता ! उन्होने कबीर को इशारा किया कि अब पानी
के लिये बोलो ! और रैदास जी ने आज पानी का नही पूछा ! तब उनकी उत्सुकता भांप
कर रैदास बोले - गोरख नाथ जी आप जिस पानी को पीने का सोच कर आय्रे हैं वो पानी
तो मुल्तान गया ! हर चीज का एक वक्त , एक मुहुर्त होता है ! अब वो घडी , वो मुहुर्त नही
आयेगा ! अब मैं चाह कर भी वो पानी आपको नही पिला सकता ! तभी से ये कहावत
पड गई कि वो पानी मुलतान गया ! क्योन्कि वो पानी पीकर कमाली मुल्तान चली गई !
सही है हर काम का एक समय एक मुहुर्त होता है ! उसको हम चूक गये तो अवसर हमारे
पास नही आता ! तो इतने सक्षम और सिद्ध संत थे रैदास जी भी कि महान योगी गोरख
भी उनके पास कुछ लेने आये थे ! सही है भक्ति अपने रन्ग मे अलग ही होती है !
सिद्धियां अपनी जगह, भक्ति मे तो सब कुछ समाहित हो जाता है ! और अन्त मे सिद्ध भी
भक्त ही बन जाता है ! जैसा गोरख के बाद के वचनों से मालूम होता है !
मग्गाबाबा का प्रणाम !