अश्वथामा ने द्रौपदी के पांचो पुत्रो के सर काटे

दुर्योधन की जंघा भीम द्वारा तोड़ दी गई ! अब इसका कुछ मतलब नही है की छल या बल कैसे तोडी गई ! दुर्योधन पानी को बाँधने की कला जानते थे ! सो वो जिस ताल के समीप गदायुद्ध चल रहा था उसी ताल में घुस गए और पानी को बाँध कर छुप गए !


असहनीय मानसिक और शारीरिक पीडाओं से गुजरते हुए ! वहाँ एक यक्षिणी द्वारा उनसे सहानुभूति दिखाने पर भी उस समय उन्होंने उसका प्रणय निवेदन स्वीकार नही किया ! और ये तो उस चंचला यक्षिणी की भूल थी ! क्या मौत के मुंह में जाता हुआ इंसान प्रेम मुहब्बत कर सकता है ?

दुर्योधन के पराजय होते ही युद्ध में पांडव विजय सुनिश्चित हो चुकी थी ! सभी पांडव खेमे के लोग विजयोंमाद में मतवाले हो रहे थे ! और आख़िर हो भी क्यूँ ना ? विजय आख़िर विजय होती है !

इधर दुर्योधन के पास अश्वथामा आता है ! और वो कहता है, हे कुरु श्रेष्ठ ! आप यह मत सोचना की हम युद्ध हार चुके हैं ! मेरे जिंदा रहते यह असंभव है ! आप मुझे सेनापति नियुक्त कीजिये !मुझे अमरत्व का वरदान प्राप्त है ! अब युद्ध का सञ्चालन मैं करूंगा ! और आपको इस युद्ध में विजयश्री मैं दिलवाउंगा !

दुर्योधन के चहरे पर एक बार फ़िर चमक सी उठती है ! सो दुर्योधन ने अपने रक्त से अश्वत्थामा के ललाट पर टीका लगा कर उसे सेनापति नियुक्त कर दिया !

अब कौरव सेनापति थे अश्वथामा ! अश्वथामा बोला - कुरुनन्दन ! मैं आज ही पांचो पांडवों के सर काट कर आपके कदमो में चढा दूंगा ! और दुर्योधन की आँखें एक बार फ़िर चमक उठी !

अश्वथामा वहाँ से निकल कर सीधे द्रौपदी के शिविर में आता है ! रात शुरू हो चुकी थी ! शिविर में विजयोंमाद छाया हुआ था ! उसको किसी ने नही रोका ! क्योंकि युद्ध तो समाप्त ही हो चुका था ! सो पहरे वगैरह सब ढीले कर दिए गए थे ! अन्दर शिविर में द्रौपदी के पांचो कुमार सोये हुए थे !

द्रौपदी को प्रत्येक पांडव से एक एक पुत्र था ! और हर पुत्र अपने पिता की हुबहू कार्बन कापी था ! पांचो कुमार बिल्कुल अपने पिता की तरह पांडव होने का ही भ्रम उत्पन्न करते थे ! पहचानना मुश्किल की पिता है या पुत्र !

अश्वथामा ने पांचो सोते हुए कुमारो के सर काट लिए और वहाँ से निकल भागा ! द्रौपदी के शिविर में अभी तक किसी को कुछ ख़बर नही ! और अश्वथामा आगया ताल में छिपे हुए दुर्योधन के पास !

आकर बोला - हे मित्र आज मेरा कलेजा ठंडा हो गया ! आज मैंने मेरे पिता की ह्त्या का बदला भी ले लिया और तुम्हारा ऋण भी उतार दिया ! लो पकडो ये पांचो पांडवो के सर ! और उसने वो मुंडो की पोटली दुर्योधन के पास खिसका दी !


अत्यन्त हर्ष और आवेश में दुर्योधन ने भीम का नरमुंड हाथ में ले लिया और अट्टहास कर उठा ! फ़िर और आवेग में आते हुए उसने भीम का मुंड दोनों हथेलियों में लेकर गुस्से में जोर से दबाया ! अरे ये क्या हुआ ? जरा सा जोर लगाते ही सर तरबूज की तरह फूट गया ! बिजली की गति से सारा माजरा उसकी समझ में आगया !

सर के पिचकते ही दुर्योधन ने माथा पीट लिया और चिल्लाकर पूछा - अरे दुष्ट अश्वथामा ये तूने क्या किया ? अरे ये भीम नही हो सकता ! क्या भीम का सर इस तरह मेरी हथेलियों से तरबूज की तरह फूट सकता है ?

जिस भीम पर मैं जब दो सो मन की गदा से प्रहार करता था तब गदा पलट कर अपने आप वापस आ जाती थी ! ये भीम नही हो सकता ! अरे चांडाल सही बता ! कहीं ये भीम और दौपदी का कुमार तो नही है ?

अब अश्वथामा ने बताया की वो पांडवो के द्रौपदी वाले शिविर में गया था और उन पांचो को पांडव समझ कर उनके सर काट लाया था !

अब दुर्योधन असहनीय पीडा से बोला - अरे चांडाल गुरु पुत्र अश्वथामा ! ये क्या किया तुने ? अरे हमारे वंश को ही तुने तो निर्मूल कर दिया ? ये आखिरी निशानी थे जो हमारे वंश को आगे बढाते ! तुने तो सब कुछ बरबाद कर दिया !

अरे दुष्ट चांडाल , दूर हो जा मेरी नजरो से ! और इस महाबली गदाधारी ने बड़ी पीडा पूर्वक अपने प्राण त्याग दिए !

उधर द्रौपदी के शिविर में कुमारो के सर कटे धड पाये जाने पर हां हां कार मचा हुआ था ! द्रौपदी दारुण विलाप कर रही थी ! कृष्ण, और पांचो पांडव किकर्तव्यविमुढ बैठे थे !

और सब यह सोच रहे थे की आख़िर अब कौन सा योद्धा बच गया जो ये कारनामा कर सकता था ? अचानक अर्जुन खडे हो गए और बोले --

मग्गाबाबा का प्रणाम !

8 comments:

  अभिषेक ओझा

24 November 2008 at 14:57

जय हो मागा बाबा ! आगे की कथा का इंतज़ार रहेगा. चिरंजीवी का आशीर्वाद प्राप्त अश्वस्थामा का क्या हुआ...

  Abhishek

24 November 2008 at 16:08

अच्छी जानकारी दी आपने. स्वागत अपनी विरासत को समर्पित मेरे ब्लॉग पर भी.

  राज भाटिय़ा

24 November 2008 at 22:55

बाबा जी पाये लागू, बहुत सुन्दर कथा कही आप ने . राम राम जी की

  seema gupta

25 November 2008 at 09:58

और सब यह सोच रहे थे की आख़िर अब कौन सा योद्धा बच गया जो ये कारनामा कर सकता था ? अचानक अर्जुन खडे हो गए और बोले --
" mahabharat ke anshon ko pdh kr accha lg rha hai....aagey kya hoga, arjun ne kya khaa hoga, aglee kdee ka intjaar rhega.."

Regards

  अशोक पाण्डेय

27 November 2008 at 02:55

मग्‍गा बाबा प्रणाम। बहुत अच्‍छी कथा आपने महाभारत की सुनायी। अब अश्‍वत्‍थामा के वध की कथा का इंतजार है।

  Anonymous

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