मैंने लंका नही जलाई : पवनपुत्र

ram-hanu अक्सर किसी भी सफलता के बाद बड़े बड़े वक्तव्य आते हैं स्व-प्रसंशा में ! जैसे आपने देखा होगा की महाभारत में विजयी होने के बाद पांडव भी इसी अतिरेक और गर्व में थे ! भीम अपनी गदा और अर्जुन अपने गांडीव को सारा श्रेय देने में लगे थे और भगवान् कृष्ण ने उनकी ओकात याद दिलाने को उस परम वीर बर्बरीक से निर्णय लेने का कहा था !


इसी तरह जब हनुनान जी माता सीता जी की ख़बर लेकर और लंका जलाकर सकुशल लौट आए तो श्रीराम के खेमे में बड़ा उत्साह और खुशी का माहौल था ! सब एक दुसरे से हँसी मजाक कर रहे थे ! महाराज  सुग्रीव, जाम्बवंत जी, हनुमान जी आदि प्रमुख सेना नायक भगवान राम  और लक्ष्मण जी के साथ बैठे थे ! और हँसी मजाक चल रहा था !


अब आप आर्श्चय चकित होंगे की इन लोगो के बीच हँसी मजाक चल रहा था ? कहीं मग्गाबाबा का माथा तो खराब नही हो गया ! असल में आपका दोष नही है ! भगवान की छवि भी हमारे दिमाग में एक उदास और लटके चहरे वाले की बना दी गई है, इन तथाकथित मर्यादावादियो ने !


अरे क्या भगवान सिर्फ़ मुंह लटकाने के लिए ही जन्म लेते हैं ? अरे  भाई भगवान कोई डरने की चीज नही है जो कई लोग आपको कहते मिलेंगे " I am God fearing man/woman.   क्यो डरते हो भगवान से ? ईश्वर तो प्रेम है ! उससे प्रेम करो ! अगर डरते हो तो तुम जरुर कोई गलत काम करते हो !


हम एक बार किसी के ब्लॉग पर जिज्ञासा वश भ्रमण कर रहे थे की उस  ब्लॉग पर किसी नए ब्लॉगर सज्जन ने लक्ष्मी जी की आरती की बड़े सुंदर ढंग से पैरोडी की हुई थी ! कुछ गलत नही था ! आप में साहस और निडरता है तो ही आप भगवान से मजाक भी कर सकते हैं ! भीरु  लोग क्या मजाक करेंगे !


फ़िर वहाँ एक मर्यादावादी की सस्नेह टिपणी दिखी " भगवान से इस तरह के मजाक नही करने चाहिए"  ये अच्छी  बात नही है ! अगर आपको लिखना ही है तो और विषय भी बहुत हैं ! लो बोलो ! अब विषय भी ये तय करेंगे !

 

और एक मर्यादावादी तो पिछले सप्ताह ही हमको भी ज्ञान प्रदान कर गया ! हमारी पोस्ट "देवराज इन्द्र ने छलपूर्वक कर्ण से कवच कुंडल लिए" पर --- नहीं इस प्रकार की कहानियों से भगवान के किस रूप को दिखाने की चेष्‍टा की गयी है ? --- अब बताईये ! हम क्या रूप दिखायेंगे ! इनको ये भी पता नही की क्या कह रहे हैं ? यहाँ किसी भगवान के दर्शन करवाने की ख़बर इनको कहाँ से मिल गई, की मग्गाबाबा ने भगवान को पिंजरे में बंद कर लिया है और लोगो को टिकट लेकर दिखा रहा है ! बहुत शर्मनाक बात है ये !


अब इसका कोई ओचित्य है क्या ? ये लोग पढेंगे लिखेंगे कुछ नही ! बस अपनी पोने दो अक्ल  लगाने कि इनको  पडी रहती है !


अब आप पूछेंगे की बाबाजी डेढ़ अक्ल लगाना तो सुना था ! अब  ये पोने दो अक्ल  क्या है ? तो आज बता ही देते हैं की ये अक्ल का फ़न्डा क्या होता है ! क्योंकि ऎसी बातो के लिए अक्ल लगाने की अक्ल भी हमें कभी कभी ही आती है !


कहते हैं की भगवान ने अक्ल बांटने का दिन घोषित किया हुवा था ! सो ये मर्यादावादी सबसे पहले उठ कर गए और लाइन में सबसे आगे खडे हो गए ! स्वाभाविक था की भगवान ने पहले ही कह दिया था की अक्ल का कुल जमा स्टाक २ किलो का है ! और फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस पर अलोटमेंट होगी ! चूंकी ये आगे खड़े थे सो इन्होने कहना शुरू कर दिया की दो में से डेढ़ अक्ल भगवान ने हमको दे दी और बाक़ी आधा किलो सारे जीवों को बाँट दी ! इस लिए ये कहावत चली डेढ़ अक्ल वाली !


अब काफी समय हो गया सो इन डेढ़ अकलों को भी शरीफ लोग झेलने के आदी हो गए ! फ़िर शुरू हो गया ब्लागिंग का कारोबार ! सो यहाँ के मर्यादावादी कुछ ज्यादा ही फटे में टांग अडाते हैं और चूंकी फटे में टांग अडाना डेढ़ अक्ल से नही हो सकता ! क्योंकि ब्लागिंग दूसरा भी कोई इतना कमजोर नही है ! वो भी छाती में बाल रखता है ! तो सारी समस्या खडी हो गई ! और इन मर्यादावादियो ने भगवान के नाक में दम कर दिया !


इनसे परेशान हो कर और  हार थक कर फ़िर भगवान जी ने अक्ल अलोटमेंट का दिन घोषित कर दिया ! और वही हुआ ! मर्यादावादी  फ़िर लाइन में आगे थे और अबकी बार ये झटक लाये दो में से पोने दो अक्ल ! बाक़ी सारी दुनिया को मिली पाव अक्ल ! सो इन पोने दो अक्लो से आप कहाँ तक बचेंगे ? इसलिए आज कल कहावत बदल लीजिये अब डेढ़ अक्ल नही लगाई जाती अब पोने दो अक्ल लगाई जाती है !


भाई खूब हंसो , खूब गाओ ! यही जीवन है ! रोते गाते काटने के बजाये हंस गाकर जिन्दगी गुजार लो ! अगर तुम सही में मर्यादावादी हो तो ओढ़ने की और ढोंग करने कि जरुरत नही हैं !  भगवान राम भी इस लिए मर्यादावादी पुरुषोत्तम कहलाये थे कि वो इन मर्यादावादियो कि तरह दुसरे को शिक्षा नही देते थे बल्कि उन्होंने स्वयं वैसा जीवन जीकर दिखाया ! इसलिए वो  मर्यादा पुरुषोत्तम  राम थे !


आपके इन मर्यादावादियो की तरह उन्होंने प्रपंच नही  किया ! जीवन में जितना झूँठा ढकोसला करोगे उतनी ही ज्यादा तकलीफ उठाओगे ! ये पका समझ लेना ! इसलिए हलके होकर जीओ ! ढकोसला मत पालो ! फ़िर देखो , तुम्हारे जीवन में बहारे आ जायेगी ! निर्भार हो जाओगे ! मत पालो इन मर्यादावादियो की फ़िक्र ! ये तो जलने के लिए पैदा हुए हैं इनके भाग्य में यही है ! इनको जलने दो ! 


इन के चक्कर में कहानी ही रह गई थी ! हाँ तो वहाँ श्रीराम ने हंसते हुए हनुमान जी से पूछा -पवन पुत्र, आपने बड़ा ही सुंदर कार्य करके मुझ पर उपकार किया है !


हनुमान - नही प्रभु ! मैंने कुछ नही किया ! ये सब आपकी कृपा थी !


श्रीरान - भाई हनुमान , तुम्हारे परम मित्र जाम्बवंत जी कह रहे हैं कि तुमने लंका जलादी ?


हनुमान - नही प्रभु, मैंने लंका नही जलाई !


श्रीराम - ये क्या कह रहे हो पवन सुत ? आप झूँठ कबसे बोलने लग गए ? सारी दुनिया में ढिंढोरा पिट चुका है कि रावण की लंका पवन पुत्र ने जला कर ख़ाक करदी और आप कह रहे हैं कि मैंने नही जलाई ? आख़िर माजरा क्या है  पवनसुत ?   हमें भी तो बताइये कि आपको झूँठ बोलने की क्या जरुरत पड़ गई ?


हनुमान बोले - हे श्रीराम , आपको मुझ पर पुत्रवत प्रेम है ! और पुत्र की बदमाशियां भी अच्छी लगती हैं ! असल में पिता अपने पुत्र पर उपरी दिखावे के लिए ही नाराज होता है ! वरना तो पुत्र की जायज नाजायज सब हरकत और उसका छोटा काम भी बड़ा लगता है !


भगवान श्रीराम मुस्करा दिए और कहा - हनुमान आगे भी कुछ बताओगे या भाषण ही पिलाओगे ?


हनुमान जी बोले - परभू इस संसार में इतना बलशाली और हिम्मत वाला कोई नही है  जो दशानन रावण की लंका जला सके ! फ़िर मेरी तो ओकात ही क्या ? दसकंधर जितना अकलवान जब लंका जैसा दुर्ग बनवाता है तो फायर प्रूफ पहले करवाता है !


अब श्रीराम चोंके और बोले - पवन सुत साफ़ साफ़ बताइये ! आप पहेलियाँ मत बुझाइये ! माना कि आप विद्ध्या बुद्धी में अजेय हैं ! पर अधीरता मत बढाइये !


हनुमान जी बोले - प्रभु आपकी बात सही है ! लंका जलते तो मैंने भी देखी थी ! मैं भी वहीं था ! पर यकीन मानिए वो मैंने नही जलाई थी ! पर मैंने ५ लोगो को मिलकर लंका जलाते देखा था !


अब तो लखन लाल जी का धैर्य जवाब दे गया ! वो बोले -- भ्राता हनुमान ! माना कि आप हम सबमे ज्यादा पढ़े लिखे हैं ! आप सूर्य के शिष्य हैं ! पर अब इतनी उंची उंची पहेलियाँ तो मत बुझाईये !


अब वो ५ कौन थे ? ये भी बता ही दीजिये !


इस पर विनय पूर्वक इस विनय की मूर्ति  हनुमान जी ने कहा  :- सुनिए :-


(१) रावण का पाप 


(२) सीता का संताप


(३) विभीषण का जाप


(४) प्रभु का प्रताप


(५) हनुमान का बाप (पवन)


इस प्रकार इस विनय की साक्षात मूर्ति ने जवाब दिया और प्रभु श्रीराम ने उठकर उनको अपने गले से लगा लिया !


मग्गाबाबा का प्रणाम !

12 comments:

  अभिषेक ओझा

11 November 2008 at 23:05

जय हो मग्गा बाबा की.. कहाँ आप ये पौने दो अक्ल वालों के चक्कर में पड़ गए ! मस्तम मस्तम... रहिये. (ओह मैं तो बाबा को ही अक्ल देने लगा... लगता है पौने २ का असर है !)

बड़ा सटीक जवाब दिया बजरंग बली ने !
मैं तो याद कर रहा हूँ... बड़े मस्त है ये पाँच कारण.

  PD

11 November 2008 at 23:42

जै हो.. मग्गा बाबा कि जै हो.. जै जै..
सबसे पहले माफी चाहूंगा.. आपके बीच का भाषण मैंने नहीं पढ़ा.. मन सच्चा है तो काहे को डरूंगा?(सॉरी, शुरू में थोड़ा सा पढा था) :D सीधा कहानी पढ़कर लिख रहा हूं.. बढिया कहानी सुनाये हैं..

  Udan Tashtari

12 November 2008 at 00:32

भूमिका में आपने बिल्कुल सही कहा..प्रेम करो, खूब हंसो और खूब गाओ. यही प्रभु भी चाहते हैं.

कथा भी खूब रही अतः मग्गा बाबा को प्रणाम और मग्गा बाबा की जय!!!

  दिलीप कवठेकर

12 November 2008 at 00:59

बहुत ही हृदयस्पर्शी और विनयपूर्ण जवाब है ये, जो चाहे मज़ाकिया तौर पर यहां कहा गया हो, बडा़ गंभीर और सारगर्भित है.

भक्ति भाव अंतिम भाव है साधना का , सत्चिदानंद को प्राप्त करने के लिये.इगो का भस्मीकरण पहली शर्त होती है.

  राज भाटिय़ा

12 November 2008 at 01:01

वाह क्या कहना बाबा जी आप का, बाकी आज आप ने मेरे मन की बात कह दी कि भगवान से कभी भी नही डरना चाहिये यह बात मेने हमेशा अपने बच्चो को सिखाई है, बाकी बात आज आप ने कह दी.
राम राम जी की

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

12 November 2008 at 06:07

(१) रावण का पाप
(२) सीता का संताप
(३) विभीषण का जाप
(४) प्रभु का प्रताप
(५) हनुमान का बाप (पवन)

... धन्य हैं आप!

  Ratan Singh Shekhawat

12 November 2008 at 07:17

बहुत सुंदर और ग्यानवर्धक कथा | स्व-प्रसंशा कभी नही होनी चाहिए |

  ab inconvenienti

12 November 2008 at 07:38

जय हो बजरंगबली की. मग्गाबाबा की भी जय.

  seema gupta

12 November 2008 at 10:05

इस पर विनय पूर्वक इस विनय की मूर्ति हनुमान जी ने कहा :- सुनिए :-
(१) रावण का पाप
(२) सीता का संताप
(३) विभीषण का जाप
(४) प्रभु का प्रताप
(५) हनुमान का बाप (पवन)
" kitna adbhut lekh hai aaj ka, ye to pehle kaheen pdha he nahee... budhe jee ke partima ke sath jultee huee lau purn rup se ek adhyatmik sthal ka aabash daite hai.."

Regards

  जितेन्द़ भगत

12 November 2008 at 23:46

बाबा, आज तो आपका मूड काफी जॉली लग रहा है, आपसे हास्‍य संवाद करने को जी चाह रहा है।
आज आपने पते की कई बात समझा दी है-
-I am God fearing man/woman. क्यो डरते हो भगवान से ? ईश्वर तो प्रेम है ! उससे प्रेम करो !

-अक्ल का फ़न्डा
और हनुमान जी का जवाब।
मै तो नतमस्‍तक हो गया बाबा।

  रविकांत पाण्डेय

13 November 2008 at 00:57

बाबा,जिस दिन अक्ल बँट रही थी मैं अपने में मस्त था, जा नहीं पाया। सो अक्ल से अपना कोई नाता कभी रहा नहीं। अतः नम्रतापूर्वक बेअक्ली की कुछ बातें कहूँ तो आप धृष्टता न समझेंगे-
"भाई खूब हंसो , खूब गाओ ! यही जीवन है ! रोते गाते काटने के बजाये हंस गाकर जिन्दगी गुजार लो !"
बाबा, बिना रोये हँसने का मूल्य कौन जान पाया है आजतक? कोई वृक्ष अपनी जड़ों को नीचे पाताल की तरफ़ भेजे बिना ऊपर कैसे उठ सकता है? जिसने सिर्फ़ हँसना जाना उसने आधा जाना, जिसने सिर्फ़ रोना जाना आधा जाना। जिसने हँसना, रोना दोनों को इकट्ठे जाना वही जीवन की संपूर्णता को उपलब्ध होता है।

  DEEP

17 September 2009 at 15:23

very good my brother!

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