अपने बारे में हनुमान जी ने बताई कुछ गूढ़ बातें

सीता जी की तलाश में राम और लक्ष्मण जंगलो में भटकते २ किष्किन्धा पर्वत के पास घूम रहे थे ! वही पर सुग्रीव अपने भाई बाली के डर से छुप कर रहते थे ! उन्होंने जब इन दोनों भाईयो को इधर आते देखा तो अपने डरपाक स्वभाव वश हनुमान जी से कहा - हनुमान , जरा आप देखो कौन है ? मुझे डर लग रहा है ! लगता है बाली भाईसाहब के भेजे लोग ही हैं ! जाओ और पता लगाओ ! अगर मेरा अनुमान सही हो तो दूर से इशारा कर देना , मैं निकल भागूंगा ! जाओ जल्दी करो !

 

hanuman3 हनुमान तुंरत पर्वत से निचे आते हैं और दोनों भाईयो से परिचय प्राप्त करते हैं ! जब दोनों तरफ़ से तसल्ली  हो जाती है तब हनुमान कहते हैं - हे श्रीराम , मेरे महाराज सुग्रीव , यहाँ अपने भाई के डर से वनवासी जीवन काट रहे हैं ! और आपकी तरह ही भार्या के विरह से भी पीडीत हैं ! उनके भाई बाली ने उनकी पत्नी को भी छीन लिया और जान का प्यासा बन कर उनके पीछे पडा है ! आप मेरे साथ ऊपर पर्वत पर उनके पास चलिए ! मैं आप दोनों की मित्रता करवाए देता हूँ सो आप दोनों मिलकर अपने लक्ष्य में सफल हो सकेंगे !


अब श्री राम ने कहा - हनुमान जी , मैं क्यों ऊपर जाऊ ?  आपके महाराज सुग्रीव की व्यथा आप ख़ुद ही बखान कर रहे हैं की, वो ये मालुम होते हुए भी,  की उनकी पत्नी उनके भाई बाली ने छीन ली और डर से छुप कर यहाँ रह रहे हैं,  तो वो बलशाली और वीर पुरूष तो नही ही हैं ! और कायर से दोस्ती करने मैं क्यों ऊपर जाऊं ? अगर उनको दोस्ती ही करनी है तो उन्हें नीचे मेरे पास आना चाहिए !


अब हनुमान ने अत्यन्त सुंदर बात कही - हे प्रभो . ये जीव तो कभी भी कुछ पकड़ कर छोड़ देता है ! पर आप तो परम ब्रह्म हैं ! अगर आपने एक बार उनका हाथ  पकड़ लिया तो फ़िर साथ नही  छूटेगा ! महाराज सुग्रीव का क्या ? आज पकड़ लेंगे फ़िर शायद कल छोड़ भी देंगे ! इस करके मैं चाहता हूँ की आप कृपा करकर ऊपर चलिए ! और मेरा मनोरथ पूरा करिए ! श्रीराम हनुमान जी की लच्छेदार बातो में आ गए और ऊपर चलने के लिए तैयार  हो गए ! और बोले - हनुमान तुम तो मुझे लक्षमण से भी दुगुने प्रिय हो !


सुनु कपि जिए मानसि जनि ऊना ! तैं मम प्रिय लछमन ते दूना !!

 

तुम्हारी बात मैं कैसे टाल सकता हूँ ? और चलने के लिए अपने डंड-कमंडल समेटने लगे !


इधर लक्ष्मण ने सुना तो उनके तन बदन में आग लग गयी ! उन दोनों की बातें सुन कर लगा की उनकी १३ साल की तपस्या भंग हो गई ! अरे दिन रात जंगलो में ख़ाक मैं छान रहा हूँ और मेरे से भी प्रिय ये बन्दर हो गया ? और छोटा मोटा भी नही, सीधे दुगुना प्रिय ! लक्ष्मण की मनोदशा इतनी खराब हो गई की लगा , उन्होंने राम के साथ वनवास में आकर अपनी जिन्दगी खराब कर ली ! लक्ष्मण के तन बदन में आग लग गई ! उनको लगा की अभी भैया राम से पूछे की - यही इनाम दिया मेरी सेवा का ? उनका मन ये सहन नही कर पाया ! मन कह रहा था की अभी लौट चले वापस अयोद्धया को ! उनका अब क्या काम ? अब ये  बन्दर महाराज मिल  तो गए मुझसे सीधे दुगुने प्रिय ! यही ढूंढ़ लायेंगे सीता भाभी को ! मन हाहाकार  करने लगा ! बस मन बगावत करने को तैयार था ! फ़िर सोचा - पहले ये बन्दर हनुमान चला जाए , फ़िर पूछता हूँ और  उसके बाद अगला कदम उठाउंगा !लक्ष्मण मन ही मन  पूरी तरह बगावत पर उतर आए !


१३ साल के वनवासी जीवन के कारण पांवो में छाले  पड़े हुए हैं ! श्रीराम सोच रहे हैं हैं ऊपर कैसे चढेंगे ? इतनी खतरनाक और सीधी चढाई पर ! उन दर्रों को कोई बन्दर ही पार कर सकता है ! श्रीराम असल में लक्ष्मण की मन की बात जान चुके थे ! और उन्होंने इसी वक्त उसका निदान करने की वजह से हनुमान जी को ये पीडा मन  ही मन  बताई !  श्रीराम की  बातें जान कर हनुमान बोले - श्रीराम आप और भैया लक्ष्मण मेरे दोनों कांधो पर सवार हो जाईये ! मैं आपको अभी पर्वत शिखर की चोटी पर पहुंचा दूंगा ! और दोनों भाई उनके काँधे पर सवार हो गए ! और हनुमान जी ने जो हैलीकोप्टर की तरह सीधे उपर की तरफ़ ९० डिग्री पर उठना शुरू किया तो लक्ष्मण दंग रह गए ! और देखते ही देखते उनको किष्किन्धा पर्वत की चोटी पर पहुंचा दिया !


लक्ष्मण ने सोचा , मैं तो सिर्फ़ शेषनाग हूँ जो अपने फन पर पृथ्वी का भार उठाये हूँ ! और ये कौन है ? जो मुझ शेषनाग सहित नारायण ( श्रीराम ) को भी अपने कंधे पर धारण कर लिया ! और इस तरीके से कोई साधारण मनुष्य या बन्दर तो नही कर सकता ? भैया सही कह रहे थे ! ये तो मुझसे भी दुगुना प्रिय होगा ही ! मैं सिर्फ़ पृथ्वी का बोझ धारण करता हूँ और ये तो मुझ शेषनाग सहित नारायण का बोझ भी धारण करता है ! तो उनका मन हनुमान के प्रति अनुराग से भर गया !


उनका बगावत करने का विचार तो काफूर हो गया और नई खट खट दिमाग में शुरू हो गई की ये मुझसे भी बलशाली कौन है जो यहाँ बन्दर रूप में बैठा है ? ऊपर पर्वत पर पहुँच कर लक्ष्मण जी ने अपनी जिज्ञासा हनुमान जी के समक्ष रखी ! उन्होंने पूछा की - आप यहाँ क्या कर रहे हैं और कौन हैं ? और आप इतने बलशाली हो कर भी ये कायर की तरह छिपे सुग्रीव को महाराज महाराज संबोधित कर रहे हैं ? मुझे समझ नही आ रहा है की आप इनकी सेवा चाकरी क्यो कर रहे हैं ! जबकि आप तो  स्वयम महाराज बनने के हर तरह से काबिल हैं !  हे वानर श्रेष्ठ आप मेरी जिज्ञासा शांत कीजिये ! 

  

ये कहानी यहाँ पुरी हुई ! हनुमान जी ने अपने और सुग्रीव के गूढ़ रिश्तो के बारे में जो बताया वो  आपने शायद पहले कहीं नही पढा  होगा   ! वो फ़िर कभी बता देंगे ! क्रमश: में हमको भी बंधन लगता है  और आपको भी लगता  है ! अब इस बंधन से आप और हम मुक्त होते हैं ! अक्सर जब भी मौज आयेगी तब यहाँ गप-शप चलती रहेगी ! हमको तो कोई प्रसंग याद आजाता है तो आपको सुना देते हैं ! 


और यहाँ जो भी प्रसंग हम आपको बताते हैं वो अमूमन ज्यादा प्रचलित नही हैं ! और ज्यादा प्रचलित प्रसंग तो आप भी जानते हैं और सारी दुनिया जानती  हैं !  ये प्रसंग कुछ टीकाकारों  ने लिखे हैं ! हमने इनकी कापी नही की है ! वर्षों पहले ये हमने पढ़े सुने होंगे ! अब याद आजाते हैं तो अपनी भाषा में लिख देते हैं !  ये काफी ज्ञानवर्धक और मनोरंजक भी हैं ! और उम्मीद करता हूँ की आपको पसंद  भी आते होंगे ! अगली बार फ़िर कुछ और किस्से बताएँगे आपको !


मग्गाबाबा का प्रणाम !

15 comments:

  mehek

9 November 2008 at 19:35

bahut hi achha laga ye bhag padhkar,khas kar bhagwan haath pakde to chodenge nahi,sahi hai.

  राज भाटिय़ा

9 November 2008 at 19:46

बाबा जी प्राणाम, अप का ग्याण सर माथे पर .
राम राम जी की

  अभिषेक ओझा

9 November 2008 at 19:57

बहुत बढ़िया ! बजरंग बली ने क्या कहा ये भी बता देते.

  अभिषेक ओझा

9 November 2008 at 19:57

बहुत बढ़िया ! बजरंग बली ने क्या कहा ये भी बता देते.

  makrand

9 November 2008 at 20:32

बाबाजी इसमे के किस्से तो नही सुनने में आए पहले कभी ? आप तो चालू रखिये ! बहुत आनंद आता है ! मन प्रशन्न हो जाता है ! इसके आगे वाला भी जल्दी ही आपकी मर्जी के हिसाब से सुना दीजिये ! उत्सुकता बढ़ गई है !

  दीपक "तिवारी साहब"

9 November 2008 at 20:34

बाबाजी को प्रणाम ! आज हम भी आगये आपकी कथा में ! बड़ा आनंद आता है ! मग्गाबाबा की जय हो !

  सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

9 November 2008 at 21:35

बाबा जी,

आपने उत्सुकता बढ़ाकर एकाएक लाइन काट दी। ...ऐसे तो हम प्यासे ही रह जाएंगे। ऐसा जुलुम मत करिए जी...। :)

हनुमान-सुग्रीव के सम्बन्ध का रहस्योद्‌घाट्न जल्दी करिएगा। प्रणाम।

  Anonymous

9 November 2008 at 21:46

नई जानकारी। बहुत अच्छा लगा।
अशोक मधुप

  ashokmadhup

9 November 2008 at 21:50

नई जानकारी । अच्छा लगा।
अशोक मधुप

  जितेन्द़ भगत

9 November 2008 at 22:18

बाबा, आपकी स्‍मृति‍ में ऐसी-ऐसी कथाऍं इस रूप में वि‍द्यमान है कि‍ आश्‍चर्य होता है, पर आप टी.वी. कम देखा कीजि‍ए, बीच-बीच में ब्रेक लेने से व्‍यग्रता बढ़ जाती है।

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

10 November 2008 at 01:13

मग्गाबाबा की जय हो!
हनुमान जी की बताई गूढ़ बातों का इंतज़ार रहेगा. अगले अंक में भक्तगण की उत्सुकता भी शांत कर दें तो मेहरबानी हो!

  Vivek Gupta

10 November 2008 at 02:55

बहुत अच्छा लगा।

  Udan Tashtari

10 November 2008 at 05:31

क्या प्रवचन देते हैं आप!! वाह!! आप तो रियल प्रवचन देना शुरु करो..हमें सेक्रेटरी बना लो, मार्केटिंग तो अच्छी करुँगा ही.

मग्गा बाबा की जय!!

सादर प्रणाम!

  PD

10 November 2008 at 09:39

aji bahut pasand aate hain..
aap apni hi bhasha me likhte rahiyega.. :)

  seema gupta

10 November 2008 at 10:39

" sach kha aapne hum,ne bhee pehle nahee pdha iss prasang ko, or pdh kr accha bhee lga or jhyan bhee bdha.... aage ke prasang ke intjar may>>"

Regards

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