श्री कृष्ण ने छलपूर्वक बर्बरीक से शीश का दान लिया !

श्री कृष्ण  समस्या पर गंभीर मंथन करके उस निर्णय पर पहुँच गए जो आखिरी निर्णय होता है ! शायद कोई भी उस समय कृष्ण की जगह होता तो इस के सिवाय कोई चारा नही होता ! बर्बरीक,  वो योद्धा अपने शिविर में रात्री  में बैठा है ! अचानक दस्तक हुई ! उसने द्वार खोला ! सामने एक ब्राह्मण खडा था ! उसने ब्राह्मण का स्वागत करके आसन दिया ! और आने का कारण पूछा ! ब्राह्मण ने कहा - मुझे आपसे दान पाने  की इच्छा है वीरश्रेष्ठ !
बर्बरीक ने कहा - मांगो ब्राह्मण ! क्या चाहिए ?


  ब्राह्मण बोला - आपको वचनबद्ध होना पडेगा ! तभी मांग सकता हूँ !बर्बरीक ने एक क्षण सोचा और बिना समय गंवाए  कहा - ब्राहमण देवता , आप आदेश करिए ! मैं आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण करूंगा ! ब्राह्मण रूपी  कृष्ण ने कहा - हे वीर श्रेष्ठ मुझे आपका शीश चाहिए !
वो योद्धा जैसे आसमान से गिरा हो ! उसने बड़ी मुश्किल से अपने आप को सम्भाला और तुंरत उसे अपनी भूल समझ आ गई की ये ब्राह्मण नही बल्कि कृष्ण है ! वो पहचान गया था !
योद्धा बर्बरीक बोला - श्री कृष्ण मैं आपको जान गया था ! जब आपने सर का दान माँगा ! अगर कोई ब्राह्मण होता तो कुछ गायें या कुछ गाँव दान में मांगता ! एक ब्राह्मण को मेरे सर से क्या लेना ? लेकिन आपसे वचन बद्ध हूँ आपकी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा ! परन्तु मेरी ये प्रबलतम इच्छा थी की काश महाभारत का युद्ध देख पाता ! और उसने अपना सर काटने की तैयारी करना शुरू करदी !

तब भगवान् श्री कृष्ण ने कहा - हे वीर श्रेष्ठ आपकी ये इच्छा मैं पूर्ण करूंगा ! मैं आपके शीश को इस पीपल की सबसे उंची शाखा पर रख देता हूँ ! और आपको वो दिव्य दृष्टी प्राप्त है जिससे आप ये युद्ध पूरा आराम से देख पायेंगे ! उस योद्धा बर्बरीक ने अपना शीश काटकर श्री कृष्ण को दे दिया ! और श्री कृष्ण ने उसको वृक्ष की चोटी पर रखवा दिया ! सबने आराम की साँस ली ! चलो एक आफत से छुटकारा मिला ! नही तो कैसा महाभारत होता ? ये आपने अंदाज लगा ही लिया होगा ? 

इस घटना के बाद महाभारत का युद्ध खत्म हुवा ! यों तो खुशी मनाने लायक किसी के पास कुछ बचा नही था ! अन्दर से सब जानते ही थे ! किसी का कुछ भी साबुत नही बचा था ! जो भी बचे थे सबके सब आधे अधूरे ही थे !किसी का बाप नही तो किसी का बेटा नही ! पीछे सिर्फ़ युद्ध की विभीषिका ही बची थी ! इसके बावजूद भी पांडव खेमे में जश्न का माहौल था ! सब अपनी २ डींग हांकने में मस्त थे ! धर्मराज महाराज युद्धिष्ठर को ये गुमान था की ये युद्ध उनके भाले की नोंक पर जीता गया ! शायद वो सोचते थे की अगर उनका भाला नही होता तो ये युद्ध नही जीता जा सकता था !

अर्जुन को ये गुमान था की बिना गांडीव के जीतने की कल्पना तो दूर इस युद्ध में टिक ही नही सकते थे ! वो भी लम्बी २ छोड़ने में लगे हुए थे ! और भीम दादा का तो क्या कहना ? उन्होंने और भी लम्बी छोड़ते हुए कहा की अगर मेरी गदा नही होती तो क्या दुर्योधन को मारा जा सकता था ! और दुर्योधन के जीते जी क्या विजयी होना सम्भव था ? सारे ही उपस्थित लोग अपनी २ आत्मसंतुष्टी में मग्न थे !

अब बात श्री कृष्ण की सहन शक्ति के बाहर हो गयी ! तो उन्होंने कहा - भाई लोगो ! आप आपस में क्यूँ ये सब झगडा खडा कर रहे हो ? मुझे मालुम था की जो भी जीतेगा वो इसी तरह की बातें करेगा ! अब मुझे याद आया की वो जो महान धनुर्धर बर्बरीक था ! उसने ये सारा युद्ध देखा है ! और तुम जाकर उससे ही क्यूँ नही पूछ लेते की कौन सा योद्धा है जिसने ये युद्ध जिताया है ? सबको बात जम गयी और सब उस वृक्ष के नीचे इक्कठ्ठा हो गए ! अब श्री कृष्ण ने पूछा -

हे परम श्रेष्ठ धनुर्धर ! आपने यह पूरा युद्ध निष्पक्ष हो कर देखा है ! और मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ की इस धर्म युद्ध को किसने जीता ? कृपा पूर्वक आप अपना निष्पक्ष मत देने की कृपा करे ! क्यूंकि यहाँ सभी वीरों में कुछ भ्रांतियां उत्पन्न हो गई हैं !

अब बर्बरीक ने बोलना शुरू किया - हे श्री कृष्ण आप कौन से धर्मयुद्ध की बात कर रहे हैं ? कहाँ हुवा था धर्म युद्ध ? अब उस वीर बर्बरीक ने धर्मराज युद्धिष्ठर की तरफ़ इशारा करके पूछा - क्या जब इन धर्मराज ने गुरु द्रोणाचार्य की ह्त्या झूँठ बोल कर करवायी ? हाँ मैं जानबूझकर ह्त्या शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ ! उनको युद्ध में नही मारा गया बल्कि उस ब्राह्मण  की षडयंत्र पूर्वक ह्त्या की गई थी ! तो क्या आप समझ रहे हैं वो धर्मयुद्ध था ? और अब धर्मराज और अर्जुन जमीन की तरफ़ देख रहे थे !

और जब दुर्योधन को सूर्यास्त के बाद भी आपने उकसा कर तालाब से बाहर आने को बाध्य किया ? और हद तो तब हो गई जब गदा युद्ध में वर्जित दुर्योधन की जंघा पर प्रहार आपने  ख़ुद करवाया भीम द्वारा ? ये क्या धर्म युद्ध था ? इस तरह उस वीर ने एक एक करके सारे वीरो की पोल पट्टी खोल कर रख दी ! उस निडर योद्धा ने तो कृष्ण को भी नही बख्शा !

अब अंत में उसने कहा - हे श्री कृष्ण अब आपको और सच्ची बात बताऊँ ? मैंने जो इस युद्ध में देखा वो यह था की इस पुरे युद्ध में ये  धर्मराज, अर्जुन , भीम, नकुल और सहदेव तो क्या ? कोई भी योद्धा नही था ! यहाँ तो सिर्फ़ आपका यानी कृष्ण का चक्र चल रहा था ! और योद्धा जो आपस में लड़ते दिखाई दे रहे थे परन्तु असल में वो आपके चक्र से  कट कट गिर रहे थे और उनके गिरते हुए सरो के पीछे मैंने द्रौपदी को अपने खुले बालों से घूमते हुए देखा ! और वो  अपने खप्पर में  रक्त भर भर  कर  उस रक्त का पान कर  रही थी ! बस इसके सिवाय और कुछ भी मैंने नही देखा ! बल्कि और कुछ वहाँ था ही नही ! अब तो वहाँ सनाट्टा छा गया ! और द्रौपदी इस तरह देख रही थी जैसे उसका जन्म लेने का हेतु पूरा हो गया हो !

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अब श्री कृष्ण ने कहा - हे वीर शिरोमणी बर्बरीक ! आपने जिस निष्ठा और साहस से सत्य बोला है ! उससे मैं बहुत प्रशन्न हूँ ! मेरे द्वारा इस लक्ष्य प्राप्ति में आपका भी अनायास ही बड़ा योगदान है ! आप अगर अपनी प्रतिज्ञा से मुकर गए होते तो ये लक्ष्य प्राप्त करना बड़ा मुश्किल था ! मैं आपको खुश होकर ये वरदान देता हूँ की आप कलयुग में मेरे श्याम नाम से पूजे जायेंगे ! और उस समय आप लोगो का कल्याण करेंगे ! और उनके दुःख क्लेश दूर करेंगे !  ऐसा कह कर श्री कृष्ण ने उस शीश को खाटू नामक ग्राम में स्थापित कर दिया ! ये जगह आज लाखो भक्तो और श्रद्धालुओं की आस्था का स्थान है ! यहाँ आज हर माह की सुदी १२ को मेला लगता है ! और फाल्गुन शुदी १२ को तो यहाँ लाखो लाखो अनुयायी सारी दुनिया से आते हैं ! आस्था और भक्ति का वो मंजर देखने लायक होता है जब लोग कोलकाता, मुंबई, मद्रास जैसी सुदूर जगहों से पैदल ही यात्रा कर के यहाँ पहुंचते हैं ! यह जगह आज खाटू श्यामजी ( जिला-सीकर, राजस्थान ) के नाम से प्रसिद्द है ! जयपुर के अत्यधिक नजदीक है ! जहाँ से रींगस होते हुए आप आसानी से वहाँ पहुँच सकते हैं !

मग्गाबाबा का प्रणाम !

15 comments:

  अनूप शुक्ल

23 October 2008 at 06:14

हमारा प्रणाम मग्गा बाबा और खाटू देव को!

  अनूप शुक्ल

23 October 2008 at 06:16

मग्गा बाबा और खाटू देव को हमारा प्रणाम!

  Vivek Gupta

23 October 2008 at 07:03

अति उत्तम |

  Ratan Singh Shekhawat

23 October 2008 at 07:24

मग्गा बाबा अपने बहुत अच्छी जानकारी दी है खाटू वाले श्याम बाबा लाखों लोगों की श्रधा के प्रतीक है

  Alag saa

23 October 2008 at 09:02

इस 'धर्मयुद्ध' में कौरवों का एक भी महारथी बिना छल के नहीं मारा जा सका था। यहां तक कि अपने पक्ष के ऐसे वीरों को भी मिटा दिया गया था, जिनसे आगे चल कर जरा सी भी बगावत की आशंका थी।

  Alag saa

23 October 2008 at 09:04

इस 'धर्मयुद्ध' में कौरवों का एक भी महारथी बिना छल के नहीं मारा जा सका था। यहां तक कि अपने पक्ष के ऐसे वीरों को भी मिटा दिया गया था, जिनसे आगे चल कर जरा सी भी बगावत की आशंका थी।

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

23 October 2008 at 09:18

भीम को हिडिम्बा से एक पुत्र हुआ घटोत्कच उस का पुत्र था बर्बरीक। यहाँ कोटा से 50 किलोमीटर भोपाल की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग-12 पर दरा अभयारण्य में एक चबूतरा है भीम चौरा नाम से जो पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। कहते हैं यहीं भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया था।

  seema gupta

23 October 2008 at 11:22

यह जगह आज खाटू श्यामजी ( जिला-सीकर, राजस्थान ) के नाम से प्रसिद्द है ! जयपुर के अत्यधिक नजदीक है ! जहाँ से रींगस होते हुए आप आसानी से वहाँ पहुँच सकते हैं !
" bhut accha lga khatu shyam jee ke khanee pdh kr, jaipur kyee baar aana jaana hua, pr hume ptaa hee nahee tha kee vheen kahee aas paas hai, ab jrur sochengen... or ye kanha palkon ko kholty band krty mantr mugdh kr rhen hain.."

Regards

  अभिषेक ओझा

23 October 2008 at 14:27

कथा तो मालुम थी लेकिन खाटू से श्याम जी वाली बात का नहीं पता था... मन्दिर का नाम तो सुना था पर अभी तक यही लगता था की कृष्ण भगवान् का मन्दिर है. सच में आशीर्वाद काम कर रहा है !

  जितेन्द़ भगत

23 October 2008 at 14:33

कथा आरंभ से अंत तक रोचक लगी बाबा। प्रणाम स्‍वीकारें।

  PD

23 October 2008 at 18:29

दिनेश जी का कहना सही है.. बचपन में पिताजी से मैंने भी यही कथा सुनी थी कि "भीम को हिडिम्बा से एक पुत्र हुआ घटोत्कच उस का पुत्र था बर्बरीक। "

वैसे कहानी अच्छी लगी..
जय मग्गा बाबा.. :)

  राज भाटिय़ा

23 October 2008 at 22:39

बहुत ही सुन्दर कथा सुनाही आप ने , कई बातो का पता इस कथा से चला, ओर दिनेश जी ने भी नयी बात बताई कि.... बर्बरीक भीम का पोता था

क्यो कि भीम का पुत्र था घटोत्कच ओर घटोत्कच का पुत्र था बर्बरीक.
बाबा जी आप का धन्यवाद कभी हमारे ठेले पर जरुर आये, खाना पीना सब मुफ़त मै.
राम राम जी की

  अशोक पाण्डेय

27 October 2008 at 20:16

मग्‍गा बाबा को प्रणाम। खेती किसानी की व्‍यस्‍तता की वजह से इनदिनों ब्‍लॉगिंग से अवकाश ले रखा है।
****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******

  सतीश सक्सेना

28 October 2008 at 16:20

खाटू श्याम का नाम कई बार सुना था ! कहानी आज पता चली , अच्छा लगा !

  RAVI

27 January 2011 at 19:01

JAI SHREE SHYAM

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