क्‍या फकीर को राजमहल का सुख उठाना शोभा देता है ? भाग-२

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यह तो ५/७ पागल दीवानों की महफ़िल है ! जहाँ बैठकर ये दीवाने सनम की बातें करते हैं ! और सनम बातो से नही मिला करते ! वो तो सनम की नजरे इनायत कभी किसी जन्म में हो जाए तो उसकी मर्जी ! पर हम सनम की बातें इस डर से करना क्यूँ छोड दे  ? अरे जब हमको सनम की बातें करने में आनंद आता है तो सनम को भी तो हम से प्रेम होगा की नही ? वो भी तो हमसे मिलने को तरस रहा होगा ? मैं तो कहता हूँ सनम को की हमें तो तू तेरे सनमखाने की बातें ही करने दे ! जब तेरी मर्जी हो तब हमारे पास आजाना ! जल्दी नही है हमें ! पर हम तेरी बातें करना नही छोडेंगे ! 

 

राजा जनक का जैसे ही बुलावा आया ! सेवक ने आकर संदेश दिया की राजा आपको स्नान करवाने नदी पर ले लेजाना चाहते हैं !अब स्नान करवाने तो क्या ? बल्कि उस संन्यासी की क्लास लगाने ले जा रहे थे ! पर राज पुरूष हैं तो थोड़े शालीन शब्द प्रयोग करते हैं ! राजमहल नदी तट पर ही था !  ऋषी-पुत्र अपनी लंगोटी उठाकर चल दिया ! राजा और संन्यासी दोनों नदी में स्नान कर रहे हैं ! संन्यासी सोच रहा है ये योगी तो हो ही नही सकता ! ये तो महाभोगी है ! देखो यहाँ कैसे दासियाँ इसके वस्त्र लिए खडी हैं ? एक तरह संन्यासी का मन बड़ा प्रफुल्लित है की इस ज्ञानी राजा के सामने स्वयं वो कितना बड़ा त्यागी है ! और वो ख़ुद की उपलब्धियां जनक की तुलना में बहुत बड़ी मान रहा था !

इतनी देर में संन्यासी देखता है की राजमहल में आग लग गई है ! अब पता नही सच में लग गई या लगवा दी गई ? जनक जैसे पागल का क्या भरोसा ? पागल और ज्ञानी में ये ही तो एक साम्यता रहती है ! लगवा भी दे आग ! संन्यासी को समझाने के लिए  ! पर कहानी तो यही कहती है की आग लग गई !  चारो तरफ़ लोग भागते दिखाई दे रहे हैं ! वो कुछ कहने के लिए राजा की तरफ़ नजर उठा कर देखता है ! उसको आश्चर्य होता है की राजा जलते महल को देख रहा है ! और दासिया उसकी पीठ पर उबटन लगा रही हैं ! आश्चर्य घोर आश्चर्य... ! संन्यासी सोचता है , कैसा बेवकूफ है ये राजा ? इसका महल जल रहा है , और इसको चिंता ही नही है !

संन्यासी इतनी देर में देखता है की आग फैलती २ नदी तट तक बढ़ रही है और अब तो जहाँ इस संन्यासी की लंगोटी  रक्खी थी, वहाँ तक आग फ़ैल चुकी है ! संन्यासी ने सोचा की  ये राजा तो महा ऐयाश दीखता है और आलसी भी ! अरे महल जल रहा है और ये स्नान में मग्न है ? तो संन्यासी जल्दी से तैर कर तट पर आया और अपनी लंगोटी उठा कर दौड़ पडा ! सही में लंगोटी ही जल गई तो फ़िर दिगंबर रह जायेगा ! आख़िर कितनी कीमती चीज है ? सो भाग लिया विपरीत दिशा में, अपनी लंगोटी उठाकर  !

क्या तो संन्यासी ? और क्या उसकी लंगोटी ? कितना मूल्य होगा उसकी लंगोटी का ? राजा का राजमहल जल रहा है ! उसी राज महल में स्वाभाविक है उसकी रानियाँ और राज कुमार / कुमारियाँ भी होंगे ! पर वो निश्चिंत है ! और एक ये संन्यासी यानी जिसने सब कुछ त्याग दिया है ! उसके लिए इतनी कीमती है लंगोटी ? जनक सब कुछ छोड़ कर , स्नान का आनंद ले रहे हैं और संन्यासी का मन बसा है लंगोटी में ! अरे वाह रे त्यागी महाराज ! धन्य है आपका त्याग और सन्यास ! इतना होने पर भी उनको जनक भोगी और ढोंगी दिखाई पड़ रहे हैं !  जनक ने सोचा होगा - ये भी किसी कलयुग का संन्यासी होगा ! इतने से इसको अक्ल नही आयेगी !  इसको कुछ और एक्स्ट्रा डोज देना पडेगा ! और बिना ज्ञान कराये छोड़ दे तो फ़िर विदेह जनक कैसे ! ये ही तो उनकी विशेषता है ! बस २४ घंटे में तो वो वज्र मुर्ख को ज्ञानी बनादे !

राजा जनक ने देखा की ये तो गया बिना ज्ञान लिए ही , तो सेवक दौडाए उसके पीछे ! कहा -  उस संन्यासी महाराज को लाओ वापस ! अभी उसकी कक्षा पुरी भी नही हुई और वो तो भाग लिया ! सेवक दौड़ पड़े उस संन्यासी के पीछे ! और थोड़ी देर में ही उसको ले कर वापस आगये !

राजा जनक ने पूछा - क्या हुवा ऋषिवर ? आप भाग क्यूँ लिए थे ? संन्यासी ने सोचा अजीब पागल है ! अब इसका क्या करे ? राजा है , पकड़वा कर बुलवा  लिया , इच्छा हो जाए तो जेल में भी डाल दे ! उसने डरते २ अपनी दुविधा बताई की आप कैसे ज्ञानी हो ? आपको इतना भी नही पता की राजमहल जल रहा है और आप दासियों में मग्न हैं ? आप तो भोगी हो !

राजा बोला - ठीक है ऋषि पुत्र ! आप अब महल चले ! दोपहर होने आई ! मुझे मालुम है आपका मन यहाँ नही लग रहा है ! आप भोजन कर ले और फ़िर थोडा विश्राम करके आप जा सकते हैं ! संन्यासी के तो जान में जान आई ! चलो अब थोड़ी देर में तो इस पागल से पीछा छुट जायेगा ! महल में शानदार दावत का प्रबंध था ! ५६ भोग .. सुंदर दासियाँ परोसने के लिए ! और भी सुंदर २ दासियाँ पंखा झल रही हैं ! संन्यासी को नहाने के बाद की भाग दौड़ में कस कर भूख लगी हुई थी ! और फ़िर इसके बाद जाने की आज्ञा मिल चुकी थी सो संन्यासी को भोजन की सुगंध से और कस कर भूख लग आई !  और संन्यासी ने मन बना लिया था की आज डट कर ५६ भोग का आनंद लेगा ! पता नही अब भविष्य में कब राजसी भोजन का अवसर मिले !

राजा जनक और संन्यासी खाने के लिए आसन पर बैठे ! संन्यासी ने देखा ठीक उसके सर के ऊपर एक नंगी तलवार बिल्कुल कच्चे धागे से लटकी हुई है ! ज़रा सा हवा का झोंका भी उसको गिरा सकता था संन्यासी के सर पर ! उसकी तो रूह काँप गई ! सोचा , ये तो बड़ा पागल है राजा ! इसको इतनी भी अक्ल नही है की इस हालत में इंसान कैसे खाना खायेगा ! पर क्या बोले ? राजा का डर भी था ! उधर तरह २ के व्यंजन परोसने का दासियाँ आग्रह करती रही ! जैसे तैसे थोडा बहुत अन्दर उतारा और कुल कोशीश यही की जल्दी से जल्दी भोजन खत्म कर के इस जगह से उठ जाय ! जिससे इस तलवार का खतरा टले !

उधर राजा इत्मीनान से ५६ भोग का आनंद ले कर भोजन उदरस्त करने में लगे हैं ! संन्यासी हाथ धोकर उठने की फिराक में है  ! पर शिष्टाचार वश राजा के पहले उठ नही सकता ! सर पर नंगी तलवार लटकी है ! बड़ी दुविधा ! सारा ध्यान तलवार में लगा है ! खाना तो क्या खाता ? जैसे ही राजा ने हस्त-प्रक्षालन शुरू किया की इन्होने तो तुंरत वो आसन छोडा ! हाथ तो धोये बैठे ही थे ! उस आसन से हटते ही जान में जान आई ! जान बची तो लाखो पाये ! अब नही आयेगा ये किसी राजा के राजमहल में  ! कसम खाली आज ! 

दासियों ने पान बीड़े पेश किए ! और जनक ने पूछा - कहिये ऋषिवर , भोजन कैसा लगा ! आपके लिए आज बिल्कुल स्पेसियल आर्डर देकर बनाया गया था ! और हमारे राजमहल के प्रधान रसोइए ने अपने हाथों से बनाया था ! मुझे तो बड़ा स्वादिष्ट लगा ! उम्मीद करता हूँ आपको भी  स्वाद तो पसंद आया होगा ? राजा का इतना पूछना  था की संन्यासी फट पडा ! उसने सोचा की अगर तलवार गिर गई होती तब भी मर ही चुके होते ! अब बोलने से भी क्यूँ चूकें ? ऐसी तैसी इस राजा की ! होगा राजा ! क्या इस तरह घर में आए के प्राण लेगा क्या ? 

वो संन्यासी बोला - राजन ! आप अजीब मसखरी करते हो ! व्यंजन तो बहुत बढिया २ बनवाये , परोसवा भी दिए ! पर स्वाद कहाँ लेने दिया ? अरे अगर सर पर तलवार और वो भी नंगी तलवार लटकी हो तो कोई स्वाद ले सकता है क्या ? सच बात तो यह है की मैं तो आपके डर से खाने का नाटक कर रहा था ! सारा ध्यान तो मेरा उस नंगी तलवार पर लगा था ! ५६ भोग का मजा क्या ख़ाक लेता ?

अब विदेह जनक बोले - ऋषिवर , आपको जिस बात को समझने के लिए आपके पिताजी ने भेजा था वो मैंने समझा दी है ! और आशा करता हूँ की आप जो मेरे को भोगी समझ  रहे थे वो भ्रान्ति भी आपकी दूर हो गई होगी  ! ऋषिपुत्र राजा जनक के चहरे की तरफ़ टक टकी लगाए देखता रहा और राजा जनक बोलते रहे !


जिस तरह तुम्हारा सारा ध्यान ५६ भोग में नही होकर भी तलवार में था ! जबकि तुम प्रत्यक्षत: ५६ भोग भोगते हुए दिखाई दे रहे थे ! और तुमने उनको खा भी लिया और तुम्हे स्वाद भी नही मालुम ! उसी तरह मैं ये सारा सुख वैभव भोगता हूँ ! पर मुझे वाकई इन भोगो का स्वाद नही मालुम !  भोगता दिखाई जरुर देता हूँ पर मेरा सारा ध्यान २४ घंटे उस तलवार रूपी ब्रह्म में ही लगा रहता है ! और ये भोग मैं चाहूँ तो भी छोड़ कर नही जा सकता , क्योंकि मेरे पिछले जन्मों के पाप पुण्य का हिसाब-किताब भी यहीं होना है !  पिछले जन्मों के शेष बचे हुए पुण्य की वजह से मैं राजा हूँ ! नए शिरे से कोई पाप पुण्य नही हों , इस लिए मैं मेरे अंत:करण में उसी ब्रह्म को स्थित देखता हूँ ! ये कर्म मुझे छू भी नही जाते ! और संन्यासी पूर्ण संतुष्ट होकर  विदेह जनक को प्रणाम करके चला गया !

मग्गाबाबा का प्रणाम !

5 comments:

  जितेन्द़ भगत

13 October 2008 at 21:12

साधो,साधो- नि‍र्लि‍प्‍त रहने का ज्ञान वाकई प्रेरक है, मन की शंका दूर हुई। आश्रम में भक्‍ि‍त की ज्‍योत जलती रहे, प्रेरक और ऊर्जावान। प्रणाम।

  सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

13 October 2008 at 22:03

बहुत रोचक और सहज ढंग से आपने जितेन्द्र जी की जिज्ञासा शान्त की है। दर्शन जैसे गूढ़ विषय को इतने रोचक तरीके से प्रस्तुत करने का आपका कौशल अद्‍भुत है। साधुवाद।

  राज भाटिय़ा

14 October 2008 at 00:05

बाबा जी आप धन्य है,बहुत ही सुन्दर सीख दी.
राम राम जी की

  अभिषेक ओझा

14 October 2008 at 16:41

जय हो मग्गा बाबा की !. छुट्टियों के बाद ये अच्छी चीज पढ़ाई आपने.

जनक तो ज्ञानी थे ही. शुकदेवजी ने भी वेद-व्यास को ज्ञान लेने के लिए जनक जी के पास भेजा था. लिप्तता और मोह जीतनी एक लंगोट में है उतनी ही संसार के सारे सुख-साधनों में भी !

एक बार इधर भी कृपा दृष्टि डालें:
http://ojha-uwaach.blogspot.com/2007/02/blog-post_28.html

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

17 October 2008 at 05:59

मग्गा बाबा की जय!
बहुत ही सुंदर! इतनी कठिन बात को राजर्षि जनक की कथा के माध्यम से आपने इतनी सरलता से कह डाला.
"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेच्छतम समाः
एवं त्वयि नन्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे"

~ईशोपनिषद

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