क्‍या फकीर को राजमहल का सुख उठाना शोभा देता है ?

कुछ व्यस्तताएं जीवन की ऐसी हो जाती हैं की हम जो करना चाहते हैं और वो समय पर कर नही पाते ! अब जैसे बीमारी को ही लेले ! इधर में  " श्री जीतेन्द्र भगत"  ने सर्जरी करवाई ! चंद दिन अस्पताल में बिताए ! और उनके प्रश्न पहले भी आते रहे हैं ! और उनका आज भी एक प्रश्न है ! जवाब देने का मूड नही था ! क्योंकि हम कुछ दूसरी पोस्ट लिखने के मूड में थे !  पर फ़िर अचानक ध्यान में आया की वो अभी अस्पताल से लौटे हैं, और उनकी जिज्ञासा का यथासम्भव जवाब देना चाहिए !

वैसे हमने ४ साल पहले  "बोम्बे हॉस्पिटल, मुम्बई"  में अपने दिल की "बाई-पास-सर्जरी" करवाई थी , तब ११ दिन वहाँ रहने का शौभाग्य हमें प्राप्त हुआ था ! हमारा ऐसा मानना है की वो ११ दिन हमारी जिन्दगी के सबसे खूबसूरत दिन थे ! उन ११ दिनों को हमने जितना एन्जॉय किया उतना कभी नही किया ! ध्यान के जितने गहरे प्रयोग हम वहाँ कर पाये वो बाहर सम्भव नही हैं ! वहाँ के डाक्टर्स भी चमकृत थे , हमारी रिकवरी देख कर ! वो आज तक हमारे मित्र बने हुए हैं और ध्यान का उपयोग  सर्जरी में स्वीकार करते हैं !  हम सोचते हैं भगत साहब भी विपस्यना ध्यान सीख के आए हैं तो उन्होंने भी कुछ उपयोग इस मौके का अवश्य किया होगा !

जीतेन्द्र भगत साहब का सवाल है :-

मग्‍गा बाबा को मेरा प्रणाम, आपके आश्रम से कई दि‍नों से दूर था। आज की कथा में फकीर की दुनि‍यादारी बहुत भाई, पर कुछ चीजें सोचता भी रहा- क्‍या फकीर को राजमहल का सुख उठाना शोभा देता है, शायद मैं फकीर होता तो ऐसा कभी नहीं करता। बंधन में बि‍ना बंधे भौति‍क सुख भोगना भी राग ही है, वैराग नहीं। गुस्‍ताखी माफ।
पि‍छली पोस्‍ट में आनंद को बुद्ध ने सही तरह समझाया। वाकई एक ही बात को समझने के लि‍ए लोगों के पास अलग-अलग बुद्धि‍ पाई जाती है।
आपके अनुग्रह का आकांक्षी...

10 October 2008 23:09

आपके सवाल के जवाब में एक कहानी सुनाते हैं ! शायद आप बात को समझ पायेंगे !

राजा जनक का नाम सबने सुना होगा ! लेकिन शायद कम लोगो को मालुम होगा की राजा जनक के लेवल का ज्ञानी दूसरा कोई नही था ! वो स्वयं  चेतना के उच्च शिखर पर थे ! उनको गुरु कहाँ से मिले ? क्योंकि स्वयं महान ज्ञानी और जैसे सीता स्वयंबर का प्रण कर लिया था इसी तरह उनका यह भी प्रण था की गुरु ऐसा चाहिए जो मुझे ज्ञान कराने में सिर्फ़ इतना समय लगाए , जितना घोडे की पीठ पर सवार होने में लगता है  ! अब बताइये ऐसा गुरु कहां मिले ? घोडे की पीठ पर सवार होने में ज्यादा से ज्यादा अनाडी आदमी को २० सेकिंड और जनक जैसे राज-पुरूष को तो पलक झपकना भी ज्यादा ही हो जायेगा !  अब ये घोषणा सुन कर कौन गुरु तैयार होगा ! इतना त्वरित ज्ञान लेने और देने में दोनों ही पक्षों का चेतना का  स्तर क्या होगा ? ज़रा कल्पना करिए ! 

अब सामने आए अष्टावक्र ! उन्होंने कहा- राजन ये तो ज्यादा समय है ! मैं तो तुमको सिर्फ़ इतनी देर में ज्ञान दे सकता हूँ जितनी देर में तुम घोडे पर चढ़ने के लिए रकाब में पाँव डालो ! बैठने तक तो बहुत देर हो जायेगी ! पर मेरी भी एक शर्त है !
राजा जनक सन्न रह गए............ !

ये अलग कहानी हुई ! फ़िर कभी देखेंगे ! यहाँ आपको ये कहानी थोड़ी सी सुनाने के पीछे उद्देश्य यह है की राजा जनक किस उच्च  स्तर के ज्ञानी पुरूष थे ! राजा जनक के पास  बड़े बड़े ज्ञानी,  महात्मा और साधू-संन्यासी ज्ञान प्राप्त करने आते थे !

एक दिन राजा जनक महफ़िल में बैठे हैं ! राज-नर्तकी नृत्य में लीन है और जनक बड़े मनोयोग से नाच-गान में मशगूल हैं ! एक संन्यासी आता है ! उसको आसन दे कर आने का सबब पूछते हैं ! वो संन्यासी कहता है - राजन मेरे पिताने मुझे आपसे ज्ञान लेने भेजा है ! जनक कहते हैं - ठीक है ! अभी तो आप भी नाच-गाने का आनंद लीजिये ! ज्ञान की बातें फ़िर कर लेंगे ! और उस ऋषी-पुत्र को भी राजा ने वहीं बैठा लिया ! बेचारा ऋषी-पुत्र ... घबरा गया.. जनक के ये हथकंडे देख कर ! उसने सोचा , शायद पिताजी से भूल हुई है ! ये मुझे क्या ज्ञान देगा ? नृत्य-गान में मशगूल रहने वाला ? शायद लोगो ने इस राजा के डर के मारे इसको ज्ञानी कहना शुरू कर दिया है ! जैसे आजकल नकली डिग्री  पी.एच.डी. की लेकर कोई अपने आपको डाक्टर लिखना शुरू करदे !   ऋषी-पुत्र का मन ग्लानी से भर गया ! उसकी इच्छा हुई की इसी वक्त निकल भागे यहाँ इस ढोंगी ज्ञानी के चंगुल से ! पर पिता की अवज्ञा का डर ! सो राजा के पास बैठा रहा ! और जनक ने भी जितना भोगीपना दिखाना था वो सब दिखाया !

रात को राजा ने उसको बढिया आलिशान राज-कक्ष में रुकवा दिया ! दासियाँ पंखा झल रही हैं, आलिशान गद्दे पर उसको नींद कहाँ ? मन ही मन पिताजी को गालियाँ देने लगा ! और जनक को तो पता नही क्या २ मन ही मन सुना डाला ! राजा जनक ने तो उसका धर्म ही भ्रष्ट कर डाला ! जिस ऋषि-पुत्र को किसी औरत जात की हवा नही लगी थी उसको औरतो से पंखा करवा दिया इस पाखंडी ज्ञानी ने ! इस पाखंडी राजा ने ये भी नही सोचा की अभी ये ऋषी-पुत्र ब्रह्मचारी है ? ओहो ..हो .. ! बड़ा अधर्मी है ये ...! रात कैसे जैसे राम राम करते निकली ! सुबह ही राजा का आदेश आगया ! शेष अगले भाग में.... !

मग्गाबाबा का प्रणाम !
( अगला भाग हम जल्द से जल्द पोस्ट करेंगे ! पोस्ट ज्यादा लम्बी होने की दुविधा होने से आज  इतना ही !)

5 comments:

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

12 October 2008 at 00:02

किसी बाबा के यहाँ घुसने से यही भय रहता है, हर बाबा दूसरे दिन बुलाने की युक्ति तैयार रखता है। आप भी?

  जितेन्द़ भगत

12 October 2008 at 00:09

बाबा को प्रणाम। ये आपने क्‍या कि‍या। मेरी अधीरता और बढ़ा दी। पोस्‍ट लंबी हो जाती कोई बात नहीं, पर इंतजार लंबा हो जाए, तो बेचैनी होती है। मैं अब भी नहीं समझ पा रहा कि‍ आप मेरी जि‍ज्ञासा को कि‍स वि‍धि‍ से शांत करेंगे। मुझे अब भी लगता है कि‍ योगी और भोगी में अंतर होता है और वह मनसा-वाचा-कर्मणा में ढलकर ही जाहि‍र होता है, यह जरुर है कि‍ सहजता इसकी अमूल्‍य नि‍धि‍ है। मन को बेचैन कर अपनाया गया आचरण ढोंग से ज्‍यादा कुछ नहीं, एक सच्‍चा फकीर सहजता को महत्‍व देता है और यही उसकी फकीरी है। आप मेरी शंका का शीघ्र नि‍वारण करें। मग्गा बाबा को मेरा सादर प्रणाम।

  राज भाटिय़ा

12 October 2008 at 00:17

अरे बाबा जब ग्याण लेने का समय आ गया तो .... बाबा ऎसा क्यो जल्दी से अगली कडी लाओ बाबा त्ब तक राम राम जी की.

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

12 October 2008 at 03:55

मग्गा बाबा की जय!
कहानी बहुत शिक्षाप्रद मालूम हो रही है. आगे की कड़ी का इंतज़ार रहेगा, धन्यवाद!

  Nitish Raj

12 October 2008 at 13:51

बाबा जी, अगली पोस्ट में पहली कहानी की शिक्षा भी पूरी कर दीजिएगा। दूसरी की तो आप पूरी कर ही देंगे। लेकिन मुझे लग रहा है कि पोस्ट लंबी होना तो एक बहाना है इस में भी तो कहीं कुछ छिपा तो नहीं हैं।

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