तुझमे और मुझमे क्या फर्क ?

एक राजा जंगल में शिकार खेलने जाया करता था ! उसी रास्ते में सड़क किनारे एक फकीर की कुटिया भी थी ! तो राजा जब भी उधर से निकलता तब उसकी फकीर से दुआ सलाम होने लग गई ! और धीरे २ राजा की उस फकीर में श्रद्धा हो गई ! अब राजा जब भी उधर से निकलता , वो फकीर को प्रणाम करता और थोड़ी देर वहाँ रुक कर फकीर की बातें सुनता ! राजा को इससे बड़ी शान्ति मिलती !

राजा को फकीर बड़ा दिव्य और पहुँचा हुवा मालुम पड़ने लगा ! अब राजा जब भी फकीर से मिलता वो हमेशा फकीर से आग्रह करता की आप राज महल चलिए ! फकीर मुस्करा कर टाल देता ! अब ज्यूँ २ फकीर मना करता गया त्यों २ राजा का आग्रह बढ़ता गया ! फ़िर एक दिन बहुत आग्रह पर फकीर राजमहल जाने को तैयार हो गया ! अब राजा का तो जी इतना प्रशन्न हो गया की पूछो मत ! राजा ने फकीर के  राजमहल पहुँचने पर इतना स्वागत सत्कार किया की जैसे साक्षात ईश्वर ही उसके राजमहल में पधार गए हों ! राजा ने फकीर के स्वागत में पलक पांवडे बिछा दिए ! और फकीर को राजमहल के सबसे सुंदर कमरे में ठहराया गया ! और राजा अपना दैनिक कर्म करने से जो भी समय बचता वो फकीर के पास बैठ कर उससे ज्ञानोपदेश लेने में बिताता ! राजा परम संतुष्ट था ! और फकीर भी मौज में !

समय बीतता गया ! अब राजा ने नोटिस करना शुरू किया की फकीर की हरकते बड़ी उलटी सीधी हो गई हैं ! राजा ने देखा - फकीर जो कड़क जमीन पर सोया करता था कुटिया में , अब नर्म गद्दों पर शयन करता है ! वहाँ रुखा सुखा खा लिया करता था , अब हलवा पूडी से भी मना नही करता ! शुरू में तो राजा, रानियाँ और राजकुमार श्रद्धा पूर्वक फकीर के चरण दबाया करते थे अब वो मना ही नही करता , चाहे सारी रात दबाए जाओ  ! और कभी २ तो दासियों को चरण दबाने को कहता है ! उसको जो भी काजू बादाम खाने को दो , मना ही नही करता ! और ऐसा आचरण तो फकीर को नही ही करना चाहिए !


और एक रोज तो हद्द ही हो गई जब वो किसी राज पुरूष द्वारा दी गई मदिरा का सेवन भी बिना किसी ना-नुकुर के करने लग गया ! अब राजा ने सोचा हद्द हो गई ! ये कैसा फकीर ? जो मैं करता हूँ वो ही ये करता है ! इसमे मुझमे क्या फर्क ? मेरे जैसे ही गद्दों पर सोता है, मदिरा सेवन करता है , दासियों से पाँव दबवाता है ! चाहे जो खाता है ! राजा को बड़ी मुश्किल हो गई ! उसकी सारी श्रद्धा जो फकीर के प्रति थी वो ख़त्म होती जा रही थी ! क्या करे ?  जिस फकीर को वह परमात्मा समझ कर लाया था ठीक उससे उलटा काम हो गया ! सही है अगर हमको सही में परमात्मा भी मिल जाए तो हम ऐसा ही करेंगे ! इंसान को जब तक जो वस्तु नही मिले तब तक ही उसकी क़द्र करता है ! वो तो अच्छा है की  भगवान समझदार हैं जो आदमी को मिलते नही हैं वरना आदमी तो उनकी भी मिट्टी ख़राब करदे !

वो कहते हैं ना की समझदार आदमी को राजा, साँप और साधू से दोस्ती नही करनी चाहिए पर यहाँ तो सिर्फ़ साँप की कमी थी ! राजा जब पूरी तरह उकता गया तो उसने फकीर से पूछ ही लिया की - बाबा आपमे और मुझमे क्या फर्क रह गया है ! अब आप फकीर कैसे ? फकीर चुप रह गया ! अगले दिन सुबह २ फकीर ने कहा- राजन अब हम प्रस्थान करेंगे !
राजा उपरी तौर पर नाटक करता हुवा बोला- बाबाजी थोड़े दिन और ठहरते ! पर मन ही मन प्रशन्न था की चलो इस आफत से पीछा छूटा ! फकीर ने अपना कमंडल जो साथ लाया था वो उठाया और चलने लगा ! राजा बोला- आपका यहाँ का सामान भी लेते जाइए ! और आपमे मुझमे क्या फर्क है इसका जवाब भी दे दीजिये ! फकीर मुस्कराया और बोला - राजन , जवाब अवश्य देंगे ! चलिए थोडी दूर हमारे साथ , हमको विदा करने थोड़ी  दूर तो  चलिए ! रास्ते में जवाब भी दे देंगे ! इस सारे वार्तालाप में राजा चलता रहा फकीर के साथ साथ ! और इसी तरह बातें करते २ नगर की सीमा तक आ गए !

अब राजा बोला - अब मेरी बात का जवाब मिल जाए तो मैं लौट जाऊं ?
फकीर कहता - बस राजन थोड़ी दूर और ! फ़िर देता हूँ आपकी बात का जवाब !
इस तरह करते २ राजा उस फकीर के साथ काफी दूर निकल आया !
राजा जवाब मांगता और फकीर कहता थोड़ी दूर  और !
अब इस तरह शाम होने को आ गई !  राजा का सब्र जवाब दे गया ! अब राजा झल्लाकर बोला - महाराज , शाम होने को आगई ! मेरे आज के  सारे राज-काज बाक़ी रह गए , राजमहल है, इतनी बड़ी राज-सत्ता है , इस तरह मेरा अनुपस्थित रहना ठीक नही है ! पीछे से कहीं कोई हमला वमला करदे ! तो क्या होगा ? अब मैं और आपके साथ नही चल सकता !आपको जवाब देना हो तो दो नही तो मुझे नही चाहिए ! क्यूँकी आपके पास कोई जवाब है ही नही !

फकीर बोला - बस थोड़ी दूर और चलो ! फ़िर देता हूँ जवाब !

अब आख़िर राजा था इतनी बेअदबी थोड़ी बर्दाश्त करता ! बोला - बस अब बहुत हो गया !
वैसे ही फकीर बोला - बस यही तो है जवाब ! राजन तुम्हारी मजबूरी है राजमहल लौटना हमारी नही ! तुम राज-महल के यानी संसार के बंधन में हो ! उसको छोड़ना मुश्किल ! और हमारी कोई मजबूरी नही कोई बंधन नही ! जितने दिन राजमहल के सुख थे उनका मजा लिया !  आज राजमहल नही है तो छोड़ने की पीडा भी  नही है ! अब आज पेड़ के निचे अपना राज-महल बनेगा ! वहाँ के सुख का आनंद उठाएंगे ! यही है तुझमे और मुझमे फर्क !  हम जहाँ जाते हैं वहीं राजमहल है और तुम्हारे लिए ये मिट्टी गारे के राजमहल में लौटना ही राजमहल है ! फर्क इसी बंधन का है ! 

तुम्हारे को इतनी आजादी नही है की अपनी मर्जी से राजमहल छोड़ दो ! तुमको लौटना मजबूरी है !  हम अपनी मर्जी से राज महल गए थे और अपनी मर्जी से आज छोड़ दिया ! हमको लौटना कोई मजबूरी नही है !

8 comments:

  राज भाटिय़ा

7 October 2008 at 03:00

वाह, क्या बात है, सच मै एक फ़कीर तो मस्त है हर जगह , ना बंधन ना कोई लालच, बहुत ही सुन्दर.्राम राम बाबा जी, प्राणाम

  Udan Tashtari

7 October 2008 at 05:52

वाह जी, फकीर के जबाब का क्या कहना!! मग्गा बाबा की जय हो -नित नई सीख देने के लिए.

  seema gupta

7 October 2008 at 08:57

" bhut achee story hai, sach mey ek sadhu ke koee majburee nahee koee bandhan nahee, jub jo mila usme hee khush, magar raja ke treh ek aam inssan bhee sansarek bandhno mey jkda hua hai or majbur hai or muktee kee koee rah bhee nahee..."

Regards

  निरन्तर - महेंद्र मिश्रा

7 October 2008 at 14:48

mast kalandar jay ho maghgha baba ki . bahut badhiya kahani taau ji dhanyawad.

  अशोक पाण्डेय

7 October 2008 at 19:56

मग्‍गा बाबा, आपका हार्दिक आभार। फकीरी की इतनी अच्‍छी परिभाषा पहले कभी नहीं पढ़ने-सुनने को मिली थी। आपके प्रवचन में अब तक जितनी कथाएं सुनीं, मुझे यह सर्वश्रेष्‍ठ लगी। आपको नमन।

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

8 October 2008 at 04:32

छोटी सी कहानी में आपने बहुत बड़ी बात बता दी, धन्यवाद!
मग्गा बाबा की जय!

  जितेन्द़ भगत

11 October 2008 at 11:39

मग्‍गा बाबा को मेरा प्रणाम, आपके आश्रम से कई दि‍नों से दूर था। आज की कथा में फकीर की दुनि‍यादारी बहुत भाई, पर कुछ चीजें सोचता भी रहा- क्‍या फकीर को राजमहल का सुख उठाना शोभा देता है, शायद मैं फकीर होता तो ऐसा कभी नहीं करता। बंधन में बि‍ना बंधे भौति‍क सुख भोगना भी राग ही है, वैराग नहीं। गुस्‍ताखी माफ।

पि‍छली पोस्‍ट में आनंद को बुद्ध ने सही तरह समझाया। वाकई एक ही बात को समझने के लि‍ए लोगों के पास अलग-अलग बुद्धि‍ पाई जाती है।
आपके अनुग्रह का आकांक्षी...

  अभिषेक ओझा

14 October 2008 at 16:59

वही जनक जी वाली बात इसमें भी है... सब कुछ करते हुए भी निर्लिप्त रहना.

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