दिवंगत प्रिय जन और हम


आप आनन्द के बारे मे हमारे कथन से चौन्क मत जाइयेगा ! आपने अगर लगे रहो
मुन्ना भाई फ़िल्म देखी होगी तो आप यकीन करियेगा कि वैसा ही सबके साथ हो
सकता है ! हम अचेतन मे सब एक दुसरे से जुडे हैं ! और अब तो शायद विग्यान
भी सहमत है कि शब्द कभी नही खत्म होता ! तो आप जितनी त्वरा से किसी पर
ध्यान लगायेंगे तो वह स्वयम आपसे आकर बात करने लगेगा ! और आप मिला कर
देख लेना ये जानकारी बिल्कुल सही होगी ! ऐसा हमने कई बार महसुस किया है !
शायद आपने भी किया होगा ! सिर्फ़ ध्यान लगने की बात है ! जो जानकारी पिछले
जन्मों की आपके अचेतन मे है , वो भी रिकलेकट हो सकती है !


पिछले कुछ दिनों से हम भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाओं का आनन्द ले रहे थे !
और पिछली पोस्ट की टिपणियों मे भाई अभिषेक जी ओझा साहब का एक सहज प्रश्न
था आनन्द के बारे मे ! और चूंकी आनन्द का भी भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाओं मे
बडा अहम स्थान है ! यह तो आपको पिछली बार मे पता लग ही गया होगा, जब बुद्ध
महारानी यशोधरा से मिलने जाते हैं तो राजमहल मे आनन्द भी साथ होता है ! अब
राजाओं के बीच हमारे जैसे किसी साधारण आदमी का क्या काम ? हमने आनन्द से बात
करने की कोशिश की ! जी हां आनन्द से ! और उन्होने अपने बारे मे बहुत कुछ बताया भी !
उसको हम आपके लिये कलम बद्ध करना चाहते थे ! पर आज ही हमारे परिचितों के यहां
श्राद्ध कर्म था ! और हम भी वहां गये थे ! वहां का माहौल काफ़ी गमगीन था ! आज कल
श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं ! अत: जो भी हिन्दू धर्मावलम्बी हैं उन सब के यहां
ये पुर्वजों को याद करने का या उन्हे श्रद्धांजलि देने का कार्य चल रहा है ! हमको इस
सन्दर्भ मे एक कहानी याद आ गई ! हमने सोचा कि अभी इस कहानी के उपयुक्त समय
चल रहा है सो पहले इसको ले लेते हैं !

एक बहुत ही सज्जन पुरूष थे ! अच्छे सात्विक भाव से रहते थे ! घर परिवार और समाज से
बहुत प्यार करते थे ! सब तरह से परमात्मा की मौज थी ! फ़िर ऐसा हुवा की कुछ ही
समयान्तर मे इनका परिवार बिछुडना शुरु हुवा और साल डेढ साल मे पुरा परिवार बिमारी
या दुर्घटनाओ मे मारा गया ! इन सज्जन की नेकी देख कर लोग परमात्मा पर भी शक
करने लगे ! वैसे मौत किस के घर मे नही होती ? और भगवान बुद्ध का तो सारा खेल ही
एक अर्थी देखने का था ! यानि बुद्ध के पिछले जन्मों के तप इतने थे कि दुसरे की मौत
देख कर ही वैराग्य हो गया ! पर इन सज्जन पुरुष की हालत भी काफ़ी खराब हो चुकी थी !
पत्नी बच्चे बच गये थे सो किसी तरह जीवन कट रहा था ! सारी खुशियां गायब ! इनकी
एक ही इच्छा कि मरे हुये मां-बाफ, भाई-बहन से किसी तरह एक बार मुलाकात हो जाये !
और ये हमेशा ही उनके वियोग मे रोया करते थे !

अब एक रोज इनको सपना आया और सपने मे ये सज्जन स्वर्ग पहुन्च गये ! और वहां इनहोने
अन्य मृतक आत्माओ के साथ अपने परिजनो को भी देखा ! और उन्हे देख कर ये बडे खुश हुये !
पर ये क्या ? इन्होने देखा कि अन्य जो आत्माएं हैं वो तो बडी खुश लग रही हैं ! और
इनके परिजन बडे उदास हैं ! और अन्य लोगों के हाथ मे जलते हुये दिये हैं जो जगमगा
रहे हैं और इनके परिजनों के हाथ मे जो दिये हैं वो दीये बुझे हुये हैं !

अब इतनी देर मे इन सज्जन को अपनी मां वहां दिखाई दी जो की बडी उदास सी खडी
थी ! ये भाग कर अपनी मां के पास गये और लिपट गये ! फ़िर इन्होने अपनी मां
से पूछा - मां , मैं देख रहा हूं कि आप लोगो के हाथ के दीये बुझे हैं अय्र अन्य
सबके जल रहे हैं और आप सब लोग उदास हैं जबकि यहां की दुसरी आत्माएं बहुत
प्रशन्न दीखाई पड रही हैं ?
अब मां ने कहा - बेटा , बात ये है कि यहां स्वर्ग मे सब हमारा बहुत खयाल रखते
हैं और कोई तकलिफ़ नही हैं ! यहा स्वर्ग के कर्मचारी दुसरी आत्माओं के दीये जब
जलाते हैं उसी के साथ हमारे भी जलाते हैं ! पर क्या करें ? तुम्हारे आंसुओं से
हमारे दिये बुझ जाते हैं ! जब तुम इतने दुखी हो तो हम कैसे सुखी रह सकते हैं ?

पहली बार इन पुरुष को ये एहसास हुवा की इनके आंसू ना सिर्फ़ जिवित परिवार जनो
को कष्ट पहुंचा रहे हैं बल्कि दिवन्गत रिश्तेदारों को भी कष्ट पहुंचा रहे हैं !

आंसू सिर्फ़ अपना और दुसरों का दुख ही बढा सकते हैं ! शायद अपने दिवंगत प्रिय
रिश्तेदारों को याद करने का सबसे अच्छा तरीका तो मुझे यह लगता है कि उनके साथ
बिताये सुन्दर क्षणों को याद करें ! और उनकी याद मे एक पेड ही लगादे ! दोस्तो यह कहानी
लिखते लिखते हमारी भी अश्रुधारा बह रही है ! आज ही के दिन माताश्री का देहावसान
हुवा था ! ये दुख के आंसू नही हैं बल्कि मां को एक श्रद्धान्जलि के रुप मे बह निक्ले हैं !
वैसे मां को कौन भुला पाया है ? साधू, सन्यासी या भगवान तक मां के चिर प्रेम
को नही भुला पाते ! साधारण इन्सान की तो बात ही क्या ? हमने मां के महाप्रयाण के १५वें
दिन तीन पेड लगाये थे ! नीम, बड और पीपल का ! आज ८ साल के हो गये ! उनमे इतनी
छाया आ गई है की आते जाते लोग भी उस छाया मे बैठ जाते हैं ! हम उनको पानी
भी अब कभी कभार श्रद्धा स्वरुप ही देते हैं ! यानी उनको पानी की जरुरत ही नही
रह गई ! धरती माता से ही जल गृहण मे सक्षम हो गये हैं ! हम तो जब तब जाकर
उनकी छाया मे बैठ जाते हैं ! और यों लगता है कि जैसे मां की गोद मे बैठे हैं !

हमारी माताजी के देहावसन के समय पुरा परिवार ही व्याकुल था ! उस समय आदर्णिय
"मानव मुनि" जी ने यह सलाह हमको दी थी ! और कहा था जब तक ये पेड छोटे हैं
और तुम इनको पानी दोगे तब ऐसा लगगा कि अपनी मां की सेवा कर रहे हो और जब
ये बडे हो जायेन्गे तो तुमको मां की गोद का सुख देन्गे ! ये मानव मुनि जी आदर्णिय
विनोबा भावे जी के साथी थे और सारा जीवन इन्होने मानव सेवा मे लगा दिया !
बिनोबा जी ने इनको यह नाम कर्ण दिया था ! और हम भी इनकी शिक्षाओं पर चलते
इस तरफ़ आकृष्ट हुये थे ! इनके बारे मे फ़िर कभी किसी समय पर और जानकारी देंगे !

मग्गा बाबा का प्रणाम !

10 comments:

  prabhakar

21 September 2008 at 17:58

पहली बार आपके ब्लाग पर आया।अच्छी अनुभूति हुई।बहुत दिनो से ऐसी बाते नही पढ पा रहा था जबकि ये कितनी जरूरी होती हैं।

  prabhakar

21 September 2008 at 17:58

पहली बार आपके ब्लाग पर आया।अच्छी अनुभूति हुई।बहुत दिनो से ऐसी बाते नही पढ पा रहा था जबकि ये कितनी जरूरी होती हैं।

  राज भाटिय़ा

21 September 2008 at 18:05

बाबा जी सब से पहले तो आप की माता जी को हमारी तरफ़ से श्रद्धांजलि ओर फ़िर जो आप ने बताया की आप ने तीन पॆड मां को श्रद्धांजलि स्बरुप लगाये तो बहुत ही अच्छ लगा काश सभी ऎसा करते तो कितना अच्छा होता, बस आज आप के साथ मे भी थोडा उदास हु गया हु, इस लिये यही राम राम, भगवान मां को अपने कदमो मे जगह दे.
धन्यवाद

  अशोक पाण्डेय

21 September 2008 at 18:50

''आंसू सिर्फ़ अपना और दुसरों का दुख ही बढा सकते हैं ! शायद अपने दिवंगत प्रिय
रिश्तेदारों को याद करने का सबसे अच्छा तरीका तो मुझे यह लगता है कि उनके साथ
बिताये सुन्दर क्षणों को याद करें ! और उनकी याद मे एक पेड ही लगादे !''

सही बात कही है आपने मग्‍गा बाबा।
मां के महाप्रयाण पर आपने पीपल, बड़ और नीम का पेड़ लगाकर बहुत अच्‍छा काम किया। इनकी छाया में सदैव मां की ममता की अनु्भूति होती रहेगी। स्‍वर्गवासी मां को मेरा कोटिश: प्रणाम।

  अभिषेक ओझा

21 September 2008 at 20:11

अच्छा प्रेरणाप्रद प्रसंग... !

  जितेन्द़ भगत

21 September 2008 at 21:48

बाबा, दो बातें बस दि‍ल को छू गई-
तुम्हारे आंसुओं से हमारे दिये बुझ जाते हैं ! जब तुम इतने दुखी हो तो हम कैसे सुखी रह सकते हैं ?

पढ़कर ऐसा भावुक हुआ कि‍ अपने एक दिवंगत प्रियजन की याद उमड़ आई। बाबा आपका आभार कि‍ आपने संभलने का सुत्र भी दि‍या-
अपने दिवंगत प्रिय रिश्तेदारों को याद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि उनके साथ
बिताये सुन्दर क्षणों को याद करें !

  Udan Tashtari

22 September 2008 at 00:02

माँ के जाने का दर्द झेल चुका हूँ, आपके दर्द को महसूस कर सकता हूँ. आपने तीन पेड़ लगा कर बहुत ही सार्थक और प्रेरक कार्य किया है. माता जी की याद को नमन!!

मन भारी हो गया मगर फिर भी कह के जाता हूँ- मग्गा बाबा, आपकी जय!!

  seema gupta

22 September 2008 at 09:23

तुम्हारे आंसुओं से
हमारे दिये बुझ जाते हैं ! जब तुम इतने दुखी हो तो हम कैसे सुखी रह सकते हैं ?
" aaj ye post pdh kr jaise ek aatmik ghyan ka anubhav hua hai, or dil sochne ko majbur ho gya hai kya aisa sach mey hotta hai??? aapka aapne maata jee ke prtee prem dekh kr bhee mn vyakul hua hai, pr aapne jo unkee yaad mey paidh lga kr unkee yaad ko unke vjud ko jinda rkha hai vo srahneey hai. bhagwan unhe shantee prdan kre"

Regards

  makrand

22 September 2008 at 21:31

wah ji kya trshna hai in heaven also u need joy

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

24 September 2008 at 09:15

पढ़कर दिल नम हो गया. ऐसे ही ज्ञान-गंगा बहाते रहिये! मग्गा बाबा की जय!

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