मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है : सिद्धार्थ





आज हम आपको यह भगवान बुद्ध के बचपन की घटना बता रहे हैं ! कुछ मित्रों के
आग्रह पर हम अब भगवाअन बुद्ध के जन्म से उनकी शादी विवाह तक की सब कहानियां
मोटे तौर पर जानते हुये आगे चलेन्गे ! कई लोगो को इसमे सन्शय है कि सिद्धार्थ को
हथियार चलाना नही आता था ! और भी कई बाते ऐसी हैं कि जो हम अवश्य जानना
चाहेंगे ! ओर आगे से हम निरन्तर इस विषय को आगे बढाने की कोशिश करेंगे !


राज कुमार सिद्धार्थ एक रोज राज महल के बगीचे मे घूम रहा है ! साथ मे उनका चचेरा
भाई देवदत्त भी है ! राज कुमार सिद्धर्थ जितना ही कोमल हृदय और सबका मन जीत
लेने वाला बालक था , देवदत उत्ना ही उदन्ड और क्रुर प्रवर्ति का लडका था ! कोई भी
उसकी प्रशंशा नही करता था ! वहीं पर सिद्धार्थ सबकी आंखो का तारा था ! और ऐसा होता
ही है ! आप एक ही परिवार मे इसके तरह के विरोधाभाषी व्यक्तित्व आज भी देख सकते हैं !

कुछ और भी बालक वहां खेल रहे थे ! सिद्धार्थ का प्रिय सखा बसंतक भी वहीं था जो की
ज्यादातर उनके मन बहलाने के लिये राज कुमार के साथ ही रहता था ! इतने मे सिद्धार्थ
ने देखा कि देवदत धनुष पर बाण चढा रहा है और उसका निशाना एक उडता हुवा हंस है !

राज कुमार सिद्धार्थ जोर से चिल्लाया - ठहरो देवदत.. रुको.. ये क्या कर कर रहे हो ?
देवदत ने जवाब दिया -- तुम्हे इससे क्या ? हम राज वन्शी हैं कुछ भी करें ! शिकार मारना
हमारा धर्म है और उसने बाण मार कर उस उडते हुये प्यारे हंस को नीचे गिरा दिया !
राज कुमार सिद्धार्थ बेसुध और व्याकुल होकर हंस के गिरने की दिशा मे दौड पडे !
और जाकर घायल हंस को ऊठा लिया ! और उसके उपचार मे व्यस्त हो गये ! राज कुमार
सिद्धार्थ के मन की दशा अत्यन्त ही करुणा जनक थी !

इधर देवदत ने बहुत हाथ पैर पटके कि हंस का उसने शिकार किया है वो उसे मिलना चाहिये !
राज कुमार सिद्धार्थ द्वारा साफ़ मना कर दिये जाने के बाद देवदत ने जाकर राज दरबार मे
सम्राट शुद्धोधन को शिकायत कर दी और न्याय की गुहार लगाई ! देवदत राज कुमार सिद्धार्थ से
जलन तो रखता ही था ! अत: मौका भी अच्छा मिल गया था ! उसको पका यकीन था
कि अबकी बार सिद्धार्थ को दन्ड मिलेगा और अपमानित भी होना पडेगा ! और बात भी
सही थी ! शिकार जिसने किया है उसी को मिलना चाहिये !

राजा शुद्धोधन ने दरबारियों को इक्क्ठा कर लिया और इस मामले मे न्याय करने के
लिये कहा ! ज्यादातर दरबारी सिद्धार्थ पर प्रेम रखते थे पर उस समय का न्याय बिल्कुल
उनके विरुद्ध जा रहा था ! और अब राजा शुद्धोधन भी क्या करे ? उन्हे ये भी डर था
कि इस फ़ैसले से नाराज हो कर सिद्धार्थ कहीं और वैराग्य का अनुभव ना करने लग जाये !
पर राजा समस्या यही होती है कि कर्तव्यों के आगे हमेशा हर राज पुरुष को
हार माननी पडी है ! इतिहास गवाह है !

दुखी मन से राज कुमार को राज सभा मे हाजिर होने का नोटिस दे दिया गया !
देवदत बडा खुश ! आज पहली बार मौका मिल रहा है सिद्धार्थ को नीचा दिखाने का !
बडा तीसमारखां बना फ़िरता है ! आज देखना .. अब क्या करता है ?
राज कुमार सिद्धार्थ अपने सखा वसन्तक और एक अन्य भाई आनन्द के साथ राज
सभा मे प्रवेश करते हैं ! उनके हाथ मे वही हंस है जिनकी जान उन्होने बचाई है !
वो धीरे २ राजा शुद्धोधन के सामने आकर खडे हो जाते हैं ! पूरी राज सभा मे सन्नाटा
छाया है ! अब क्या होगा ?

न्यायालयीन कार्यवाही शुरु हुई ! मन्त्री ने जो आरोप देवदत ने लगाये थे वो सब
पढ कर सुना दिये ! राजा शुद्धोधन ने पूछा - तुमको अपनी सफ़ाई मे कुछ कहना है ?
वैसे सब राज दरबारी जानते थे कि इसमे सफ़ाई देने जैसा कुछ भी नही है! सिद्धार्थ
को यहां नीचा देखना ही पडेगा और दन्डित भी होना पडेगा ! राज सभा उत्सुक है कि
अब राज कुमार सिद्धार्थ क्या कहते हैं !

सिद्धार्थ ने बडे सयंत वचनों से बोलना शुरु किया ! बचपन से ही सिद्धार्थ कि बोली
इतनी कर्णप्रिय और मीठी थी कि सुनने वाले पर जादू कर देती थी ! उन्होने बोलना शुरु किया!
महाराज , देवदत का कथन सही है ! हंस को उसने मारा है और आपके कानून के अनुसार
उस पर उसी का अधिकार है ! पर एक कानून और है कि मारने वाले से बचाने वाला बडा
भी होता है और अधिकार भी बचाने वाले का ज्यादा होता है ! उस अधिकार के नाते
इस हंस पर मेरा अधिकार है ! और मैं इसके स्वस्थ होने के बाद इसको आजाद परिन्दे
की तरह उडने के लिये आकाश मे छोड दुंगा !

सिद्धार्थ का तर्क सुन कर पूरी राज सभा मे खुशी की लहर दौड गई और सबने राजकुमार
की बडी प्रसंशा की ! राजा ने सभासदों से विचार विमर्श के बाद हंस सर्व सम्मति से
सिद्धार्थ को सौंप दिया ! और सिद्धार्थ ने उसको भला चन्गा होने के बाद आकाश
मे उडने के लिये आजाद कर दिया ! ऐसा विलक्षण था बुद्ध का बचपन ! कितना प्रेम और
करुणा से ओत-प्रोत था भगवान बुद्ध का बचपन !

मग्गाबाबा का प्रणाम !

9 comments:

  जितेन्द़ भगत

23 September 2008 at 09:15

अच्‍छी कथा थी बाबा, आता रहूँगा सुनने।

  seema gupta

23 September 2008 at 09:24

ऐसा विलक्षण था बुद्ध का बचपन ! कितना प्रेम और
करुणा से ओत-प्रोत था भगवान बुद्ध का बचपन !
" bhut sunder sansmaran, bachpan mey pdha tha magar ab yaad nahee, aaj pdh kr fir yaad aa gya... or sach bhee to hai "jako rakeh saiyan maar ske na koee"
Regards

  अभिषेक ओझा

23 September 2008 at 13:14

"मारने वाले से बचाने वाला बडा
भी होता है और अधिकार भी बचाने वाले का ज्यादा होता है !"

ये कहानी किसी किताब में बचपन में पढ़ी थी... अच्छा चल रहा है महात्मा बुद्ध का वृतांत.

  अशोक पाण्डेय

23 September 2008 at 18:45

सत्‍य वचन बाबा। मारनेवाले से बचानेवाला बड़ा होता है। विद्यालय की पाठ्यपुस्‍तक में पढ़ी इस कथा का स्‍मरण कराने के लिए आभार। हमारा प्रणाम स्‍वीकार करें।

  Udan Tashtari

23 September 2008 at 19:06

बहुत बढ़िया लगा कथा सुनकर. मग्गा बाबा की जय. कभी आश्रम का पता दिजिये. भक्त वहीं आकर साक्षात दर्शन कर लेगा...बोलो, मग्गा बाबा की जय!!

  विक्रांत बेशर्मा

23 September 2008 at 20:25

बचपन में इस कथा को सुना था...आज भी इसमें वही बात है जो पहले थी ....मारने वाले से बचाने वाला हमेशा बड़ा होता है ....पढ़ कर बहुत अच्छा लगा !!!!!!!!!!

  राज भाटिय़ा

24 September 2008 at 02:05

मारने वाले से बचाने वाला बडा
भी होता है और अधिकार भी बचाने वाले का ज्यादा होता है ! बाबा जी यह कहानी शायद हमारे पाठ मे थी, बहुत साल बाद पढ कर मजा आ गया.
धन्यवाद राम राम जय बोलो बाबा मग्गा डाट काम की

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

24 September 2008 at 09:13

"मारने वाले से बचाने वाला बडा भी होता है और अधिकार भी बचाने वाले का ज्यादा होता है!"
सच है - मग्गा बाबा की जय!

  हिन्दुस्तानी एकेडेमी

30 September 2008 at 16:27

आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
(हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
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