कालातीत महायोगी गुरु गोरखनाथ

आदिनाथ एक पौराणिक नाम है ! आदिनाथ शायद उद्गम हैं ! जैन आदिनाथ को अपना प्रथम तीर्थंकर
मानते हैं ! ऋषभ देव और आदिनाथ दोनो उन्ही के नाम हैं ! जिनसे शुरुआत हुई ! इसलिये आदिनाथ हैं !
ऋग्वेद मे भी अति सम्मान पुर्वक आदिनाथ और ऋषभ देव जी का वर्णन मिलता है ! हिन्दु परम्परा ने भी
उनको पूरा सम्मान दिया है ! तान्त्रिक भी यह मानते हैं कि आदिनाथ से ही तन्त्र की शुरुआत हुई ! और
समस्त सिद्ध योगी भी यही मानते हैं कि आदिनाथ उनके प्रथम गुरु हैं ! ऐसा दिखाई देता है कि इस
देश की सारी परम्पराएं इस महान व्यकतित्व से ही निकली हैं !

पर देखिए ... गुरु गोरख क्या कहते हैं ?


आदिनाथ नाती मछिन्द्रनाथ पूता !
निज तात निहारै गोरष अवधूता !!



अब देखिये - जिस आदिनाथ को उद्गम माना गया है उसको गोरख अपना नाती बता रहे हैं और अपने ही गुरु
मछिन्द्रनाथ जी को अपना पूत यानि कि बेटा बता रहे हैं ! और अपने बेटे बेटियों को, अपने नाती पोतों को
देख कर मैं बडा प्रशन्न हूं !

लगता है गुरु गोरख नाथ जी कुछ खिसक गये हैं ? पर नही ! असल मे इस तरह के वचन उल्ट्बासी कहे
जाते हैं और इनका सबसे ज्यादा उपयोग या कहे सर्व प्रथम उपयोग कबीर साहब ने किया है !
गोरख वचन बहुत प्रिय हुये हैं ! और लोक जीवन मे भी इनको बडा ऊंचा स्थान मिला है ! गोरख
जब बोलते हैं तो उसी ऊंचाई से बोलते हैं जिस ऊंचाई से कृष्ण गीता मे बोलते हैं ! यानी जिसको
भी ज्ञान हो गया ! फ़िर वो स्वयम ही परमात्मा हो गया ! फ़िर बूंद समुद्र मे समा गई ! अब कौन गुरु
और कौन चेला ! सारे भेद खत्म हो गये ! गीता मे कृष्ण कहते हैं की, हे अर्जुन तू मेरी शरण आ जा !
मैं पर काफ़ी जोर है ! क्योंकी ये परमात्मा कृष्ण बोल रहे हैं ! ऐसे ही गोरख कहते हैं :-

अवधू ईश्वर हमरै चेला, भणीजैं मछीन्द्र बोलिये नाती !
निगुरी पिरथी पिरलै जाती, ताथै हम उल्टी थापना थाती !!


वो कह रहे है कृष्ण के जैसे ही -- हे अवधूत स्वयम ईश्वर तो हमारे चेला हैं और मछिन्द्र तो नाती
यानी चेले का भी चेला है ! हमे गुरु बनाने की जरुरत नही थी लेकिन अज्ञानी लोग बिना गुरु के ही
सिद्ध बनने का नाटक नही कर ले ! इस लिये मछिन्द्र को हमने गुरु बना लिया जो वस्तुत: उल्टी स्थापना
करना है , क्योन्की खुद मछिन्द्र नाथ हमारे शिष्य हैं !

असल मे जिनको भी ज्ञान हो गया उसकी प्रतीति ऐसी ही होती है ! वह ब्रह्म स्वरुप हो गया ! वह
खुद ब्रह्म हो गया अब सब कुछ उसके बाद है ! वह समयातीत हो गया ! काल और क्षेत्र के बाहर
हो गया ! तो इन ऊंचाइयो पर थे गुरु गोरखनाथ ! इन्ही गुरु गोरख , कबीर और रैदास जी का
एक किस्सा हमको एक महात्मा ने सुनाया था ! वो हम आपको अगले भाग मे सुनायेन्गे ! और आप
कबीर के बारे मे तो अच्छी तरह जानते होंगे और उनकी सिद्धियों के बारे मे भी जानते होंगे !
पर शायद रैदास जी की इन विशेषताओं का आपको मालूम नही होगा ! इन तीनो ज्ञानीयों की मुलाकात
का ये एक मात्र दृष्टान्त सुनने मे आया है ! जो हम आपको सुनाना चाहेन्गे ! और आप दूसरो की
तरह रैदास जी के नाम पर नाक भों मत चढाना ! बडे सिद्ध पुरुष हुये हैं ! और जब राज रानी
मीरा कह्ती हैं कि " गुरु मिल्या रैदास जी " तो सब बाते खत्म ! मीरा जैसी भक्त का गुरु कोई
साधारण मनुष्य नही हो सकता !

तो इन्तजार किजिये, इन तीनो महान संतो के मिलन और चम्तकारिक घटनाओं के बारे मे जानने का !

मग्गाबाबा का प्रणाम !

5 comments:

  राज भाटिय़ा

13 September 2008 at 01:52

बाबा जी नीदं बडी जोरो से आ रही हे जाते जाते टिपण्णी दे रहा हु, आप का लेख मन को बहुत अच्छा लगा, सव हे जब कोई भगवान की भक्ति मे इतना खो जाये की उसे पता ही नही चलता की वो भगवान मे हे या भगवान उस मे जेसे गुरू नानक देव जी थे, बस तेरा तेरा ही करते रहे .
अच्छा बाबा जी राम राम कल फ़िर से आऊगा

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

13 September 2008 at 09:29

महापुरुषों की बात को समझने के लिए भी बहुत समझ की ज़रूरत है.
"मेरा मुझ में कुछ नहीं..."

मग्गा बाबा की जय!

  जितेन्द़ भगत

14 September 2008 at 12:19

बाबा, कबीर आदि‍ की बातें जानकर तो मजा आ जाएगा, पर क्‍या इनसे पहले के महापुरूषों, बुद्ध,महावीर आदि‍ के बारे में भी जानने की इच्‍छा है। आपके पि‍टारे में इनकी महि‍मा की बातें हो तो आगे हमें जरुर अवगत कराएँ।

  अनूप शुक्ल

14 September 2008 at 19:32

सुन्दर ज्ञान दे गये मग्गा बाबा!

  सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

14 September 2008 at 20:54

मैने गोरखपुर में ४-५ साल बिताया है। तब गोरखनाथ मन्दिर नियमित जाना होता था, किन्तु बाबा गोरखनाथ की अलौकिक क्षमता और सिद्धियों के बारे में ऐसी जानकारी मुझे नहीं थी। उनके हठयोग दर्शन के बारे में जरूर किताबों में पढ़ा था।

आपकी सभी पोस्टें नियमित पढ़ा करता हूँ। मैं दर्शन का ही विद्यार्थी रहा हूँ। आप बहुत रोचक ढंग से लिख रहे हैं। साधुवाद।

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