गुरु मछिंदर नाथ फंसे मोह माया में

गुरु गोरख नाथ के गुरु थे परम योगी गुरु मत्स्येन्द्र नाथ ! जिन्हे लोग मछिन्दर नाथ
के नाम से भी जानते हैं ! शायद आपने बचपन मे एक कहावत सुनी होगी कि "जाग
मछिन्दर गोरख आया " ! जी हां इन्ही की बात मैं कर रहा हूं ! यह कहानी तो आप लोगो
ने अवश्य सुनी होगी ! यह कहानी गुरु और शिष्य के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानी है
कि एक गुरु अपने शिष्य को कितना पुत्रवत प्यार करता है ! और शिष्य के वियोग मे गुरु
पित्रवत मरणासन्न दशा मे पहुंच जाता है ! यहा हम इन दोनो ही योगियो की एक अन्य
कहानी की बात करेंगे जो की कम प्रचलित है ! पर है मजेदार ! इस कहानी को हम दो या
तीन किश्तों मे पुरा करेंगे ! अब ये कोई मुम्बई से लन्दन की फ़्लाईट तो है नही , जो हम ५
घंटो मे पुरी कर ही लेन्गे ! भाई कहानी है ! कहीं ठहराव ज्यादा कम भी हो सकता है !

जैसे बालक को अपने पिता से बडा हीरो कोई दूसरा नही लगता और वो अपने पिता की बुराई
नही सुन सकता वैसे ही ये बात शिष्य के लिये भी लागू होती है ! गुरु शिष्य के रिश्ते
बिल्कुल पिता-पुत्र जैसे ही होते हैं ! और इसको गुरु शिष्य ही समझ सकते हैं !
हुआ ऐसा था कि गुरु मछिन्दर नाथ जी भ्रमण करते हुये पुर्वोत्तर भारत की यात्रा पर थे !
और उधर ऐसा हुवा की वहां की राज कन्या के रुप योवन के जादू मे गिरफ़तार हो गये !
और उस राज कन्या से शादी कर ली ! सब योगी गिरि छोड छाड कर मोह माया मे पड गये !
और वहीं रहने लग गये ! वहीं उनको उस राज कन्या से एक पुत्र की प्राप्ति भी हो गई !

इधर गोरख नाथ और उनके दुसरे गुरु भाईयों को दुसरे पन्थ वाले ताने मारा करते थे !
और कहा करते थे कि ये लोग काहे के योगी हैं ? ढोंगी हैं ! इनका गुरु मछिन्दर नाथ तो
शादी करके दुनिया दारी मे पडा है ! आदि आदि ! और यह जो गुरु की गलती शिष्यों को
भुगतनी पड रही थी ! गोरख नाथ जी को भी बहुत बुरा लगता था ! यह ऐसे ही था जैसे
किसी बच्चे को कोई उसके पिता के बारे मे कुछ कहे ! और साधू समाज मे तो आज भी इस बात्त
को लेकर खून खराबा तक हो जाता है ! खैर साहब .. गोरख ने अपने साथियों से चर्चा की !
और यह तय हुवा की - अब बहुत हो गया ! गुरु मछिन्दर नाथ को वापस उस मोह जाल से निकाल
कर लाना ही पडेगा ! और उनको लाने गोरख जायेंगे ! क्योंकी गोरख उस समय तक महान सिद्ध
योगी बन चुके थे ! पर क्या करे ? गुरु के कारण सब बेकार ! अब गोरख वहां पहुंच गये !
जहां गुरु मछिन्दर का महल था ! सन्देश भिजवाया ! पर गुरु मछिन्दर ने हर बार मिलने मे
आनाकानी की ! उनको लग गया था कि ये मुझको लिये बगैर वापस लौटने वाला नही है !

अब गोरख को वहां काफ़ी समय हो गया ! पर गोरख अपने गुरु से अपने मन की बात कह सकें,
इतना मौका ही उनको नही मिला ! मछीन्दर नाथ जी ने गोरख सब सुख सुविधा दे रखी थी !
पर जैसे ही गोरख काम की बात पर आते , वो बात पलट दिया करते थे ! और चुंकी वो गुरु
थे अत: गोरख उनसे कुछ उल्टा सीधा भी नही बोल सकते थे ! मछिन्दर तो बस सब समय उस छोटे
बच्चे को ही खिलाया करते थे ! और महल के बाग बगीचों मे उसको लेकर घूमा करते थे !
महल भी बडा रमणीय था ! पास ही बगीचा और साथ ही बहती नदी ! वहीं गुरु मछीन्दर, बालक
को लिये घूमा करते थे ! उनका प्रेम अब रानी मे कम और बेटे मे ज्यादा हो गया था ! गोरख
इसी उधेड बुन मे रहते थे कि किसी तरह गुरु अकेले मे मिल जायें और उनको समझाने की कोशीश
करें ! पर मछीन्दर के साथ तो कभी रानी कभी दासियां ! भरपूर महफ़िल रहती थी !

एक दिन ऐसा हुवा की बच्चे को लेकर मछीन्दर बगीचे मे टहल रहे थे ! और देव योग से
अकेले ही थे ! और यों हुवा की राजकुमार जी हां . उनका बेटा ! उसने उनकी गोद मे
मल मुत्र त्याग कर दिया ! और दोनो पिता पुत्र उसमे गंदे हो गये ! अब गोरख ने देखा की
उनके गुरु बडे प्रेम से उस बच्चे की गन्दगी साफ़ कर रहे हैं ! उनको बडा आश्व्हर्य हुवा !
वो मौका देख कर मछीन्दर नाथ के पास पहुंचे और बोले - गुरुदेव ! आप छोडो मै धो कर
लाता हूं राज कुमार को नदी पर ! मछीन्दर नाथ ने सोचा - ठिक है तब तक मैं अपने आपको
साफ़ कर लेता हुं !

थोडी देर हो गई ! गोरख नही आये तो उनको चिंता होने लगी ! इतनी देर मे गोरख उनको
अकेले आते दिखाई पडे ! उनकी चिन्ता और बढ गई ! इतनी देर मे गोरख आ गये !
मछिन्दर बोले - राज कुमार कहां है गोरख ?
गोरख - गुरुदेव उसको तो मैने धो कर सुखा दिया !
मछिन्दर - इसका क्या मतलब ?
गोरख बोले - गुरु जी आपने उसको धो कर लाने को कहा था ! और वो बुरी तरह
गन्दगी मे सना था ! सो मैने उसकी दोनो टान्गे पकड कर उल्टा किया ! और फ़िर उसको
खूब सर की तरफ़ से नदी मे डुबोया निकाला ! और फ़िर जैसे धोबी कपडों को पछाडता है ! उस तरह
मैने उसको पत्थर पर पटक पटक कर पछीटा ! तब जाकर बड़ी मुश्किल से उसकी गन्दगी साफ़ हुई !
और फ़िर उसमे ज्यादा जान तो थी नही ! इतना धोने के बाद केवल कुछ हड्डियां ही बाकी
बची थी ! सो वो सूखने के लिये वहीं एक पत्थर पर रख आया हूं !

और गुरु मछिन्दर तो इतना सुनते सुनते ही आधे पागल जैसे हो गये ! और उन्होने पुछा !
अरे गोरख - ये क्या किया तुने ! अरे मेरे राज कुमार ने तेरा क्या बिगाडा था ?
हाय मेरा बेटा कहां है ? इस तरह प्रलाप करने लग गये ! और थोडी देर बाद बेहोश हो गये !
अब गोरख उनको होश मे लाने का उपाय करने लगे !
शेष अगले भाग मे .....( राज कुमार का क्या हुवा ? क्या गुरु को वापस ले जाने मे गोरख
कामयाब हुये ?)

मग्गा बाबा का प्रणाम !

7 comments:

  जितेन्द़ भगत

6 September 2008 at 01:13

बड़ी ही रोचक कथा छेड़ दी है आपने। मेरे पापा सुबह-सुबह कई बार गुनगना उठते हैं- भाग मछेन्‍दर गोरख आया। पर उनसे अर्थ पूछने का कभी ख्‍याल ही नहीं आया। अब मेरी जि‍ज्ञासा पूरी होगी, पर लगता है कुछ इंतजार करवा कर ही आप कथा पूरी करेंगे। चलि‍ए य सही।‍

  राज भाटिय़ा

6 September 2008 at 01:57

बाबा जी राम राम भाई सोने से पहले एक बहुत ही अच्छी कथा पढ ली, इस के लिये बहुत बहुत धन्यवाद,
अगली कडी का इन्तजार हे

  Udan Tashtari

6 September 2008 at 03:52

जय हो मग्गा बाबा की!! धन्य हुए कथा सुनकर. अगले भाग का इन्तजार है.

  अशोक पाण्डेय

6 September 2008 at 18:45

गोरखपंथी संतों की सारंगी पर बाबा गोरखनाथ और राजा भतृहरि के किस्‍से पहले खूब सुने हैं। गांव गांव घूमनेवाली नाट्य मंडलियों द्वारा राजा भतृहरि पर खेला जानेवाला नाटक ग्रामीणों में काफी लोकप्रिय हुआ करता था। अब तो ये बातें सिर्फ स्‍मृतियां हैं।

आपके मुंह से अब यह बाबा गोरखनाथ की कथा सुनना बहुत अच्‍छा लग रहा है। आप खूब सुनाएं, हम सुन रहे हैं।

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

6 September 2008 at 23:07

मग्गा बाबा की जय! कथा के अगले भाग का इन्तजार है!

  जितेन्द़ भगत

7 September 2008 at 00:51

बाबा, एक दि‍न गुजर गया इंतजार में, जल्‍दी अगली कड़ी लगाने की कृपा करें।

  योगेन्द्र मौदगिल

7 September 2008 at 09:36

Wah...Maharaaj
Jai ho.....................

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