दशानन द्वारा मुहूर्त संपन्न और भोलेनाथ का दक्षिणा के लिए आग्रह

कैलाश पर बडे उत्साह का माहोल था ! जिसे देखो काम मे व्यस्त ! भोलेनाथ
इससे पहले सान्सारिक कामों मे इतने व्यस्त पहले कभी नही देखे गये ! माता
पार्वती का तो हाल ही मत पुछो ! किस मेहमान को कहां ठहराना है ? किस तरह
सब व्यवस्थाएं होंगी ? इसी कार्य मे व्यस्त थी आज कल ! कुछ नजदीकी लोग आ भी चुके
थे ! वो इस स्वर्ण नगरी को देख कर रोमांचित थे ! इतना सुन्दर नगर अब से पहले
इस संसार मे पहले कभी नही बना था ! अभी आप को इस पर यकीन नही हो रहा होगा !
पर आगे आपको मालूम पडेगा कि इस नगरी की भव्यता और ऐश्वर्य का वर्णन कवियों
ने किस तरह किया है ?
इतना भव्य निर्माण सम्पन्न हो चुका था ! बस तैयारी थी इसके
ग्रह प्रवेश की ! ब्रह्माजी से विचार विमर्श अनुसार पराक्रमी दशानन को भोलेनाथ ने
निमन्त्रण और निवेदन दोनो भेज दिये थे ! बस सिर्फ़ महाराज दसग्रीव दशानन की स्विक्रिति
आने का सभी को बेसब्री से इन्तजार था ! और माता पार्वती को तो पूरा यकीन था कि
दशानन रावण की स्विक्रति मे कोई अडचन ही नही होगी ! क्योंकी माता पार्वती को भोले
नाथ और दशानन रावण के रिश्तों के बारे मे पता था !


उधर महाराज दशानन अपने नित्य कर्म अनुसार शिव जी की पूजा मे तल्लीन थे ! अचानक
उनको लगा कि भोलेनाथ ने आवाज दी है ! महाराज रावण ने आंखे खोल दी ! सामने देखा-
साक्षात भोलेनाथ खडे हैं ! दशानन की मानो मुराद पूरी हो गई ! भोले नाथ नमन
करना चाहते थे दशानन को ! क्योंकी वो उसे अपना पुरोहित बनाना चाहते थे ! और
पुरोहित को आदर देना हमारी परम्परा रही है ! परन्तू महाराज रावण तो इतने अभिभूत
हो चुके थे कि भोलेनाथ को देखते ही भोले के चरणो से लिपट गये ! भोलेनाथ ने ऊठा कर
अपने प्रिय शिष्य दशानन को गले से लगा लिया ! दोनों पता नही कब तक इसी अवस्था मे
लिपटे खडे रहे ! ये मिलन ऐसा ही था जैसे जीव ( दशानन ) और ब्रह्म ( शिव ) का मिलन हो !
आज दशानन का यह जीवन सफ़ल हो चुका था ! स्वयम शिव उसके दरवाजे आये थे !
जीव स्वयम ब्रह्म के पास जाता है ! पर यहां तो ब्रह्म ही जीव के पास चला आया !
महाराज दशानन की श्रेष्ठता का अनुमान सिर्फ़ एक इसी घटना से भी लगाया जा सकता है !
इस महाबली मे वो आकर्षण था की क्या जीव और क्या ब्रह्म ? सब इससे अथाह प्रेम करते थे !
जो कुछ गल्तियां इस पराक्रमी ने की या जो कूछ इतिहास मे लिखा गया ! उनके बारे मे भी
इस महाबली ने मुझे बताया था ! उनका फ़िर कभी हम उल्लेख विषयानुसार करेंगे !
फ़िल्हाल तो महाराज दशानन खो गये यादों मे !


और एक बात शायद आपको पता हो और नही भी हो ! महाराज दशानन का नाम रावण
भी भोले नाथ का ही रखा हुवा था ! अब आप को ये बात आश्चर्यजनक लग सकती है !
पर हकीकत यही है ! दशानन को भोले बाबा इतना प्रेम करते थे की दशानन के रोने
मे भी उनको सन्गीत सुनाई देता था ! इसी रोने की वजह से उन्होने प्यार का नाम
दे दिया उसे रावण !
और आगे जाकर इसी नाम से ये महाबली प्रसिद्ध हुआ !
बहुत देर बाद दोनो होश मे आये ! और दशानन भोले बाबा को आसन पर बैठा कर
खुद उनके चरणों मे बैठ गया ! दशानन को जो लोग अहंकारी और हठ वादी कहते
हैं उनको शायद मालूम नही है कि वो सिर्फ़ एक पक्ष को ही सुन रहे हैं ! दशानन
की आज तक किसी ने सुनी ही नही ! वैसे इस महाबली को कभी इस बात की फ़िक्र
भी नही रही ! वैसे कोई भी शूरवीर बिना विनय शील हुये शूरवीर नही हो सकता !
और इस शूरवीर की विनय शीलता के तो स्वयम भोले नाथ भी कायल हैं !


भोलेनाथ का यथोचित पुजन सम्मान करने के बाद भोले नाथ ने अपना प्रयोजन
बताया ! और यह सुन कर तो रावण के हर्ष की कोई सीमा ही नही रही ! रावण उस
घडी का इन्तजार करने लगा ! और भोलेनाथ को आश्वस्त किया कि वो समय
पर वहां पहुंच कर सब काम सम्भाल लेगा ! रावण का तो मनोरथ पुर्ण होने वाला था !
नियत समय पर रावण कैलाश पहुंच गया था ! वहां का महोल ऐसा था कि सब देव
मुनि ये सब तो वहां मोजूद थे ही और भोले बाबा के प्रिय भूत प्रेत, चुडैल और उनके
भांति भांति के गण भी वहां उपस्थित थे ! कहने का मतलब यह कि समाज के क्रिमी
लेयर से लेकर तो निचले तबके के लोग भी इस समारोह मे बिना किसी भेदभाव के
शामिल थे ! और यही खासियत भोले नाथ को त्रिलोकीनाथ बनाती है ! है कोई और
देव दानव जो इस तरह सबको साथ लेके चल सके ? वाह भोले नाथ प्रणाम है आपको !


दशानन ने मुहुर्त का कार्य शुरु करवा दिया ! और समस्त देव, दानव, मानव और
तमाम उपस्थित लोग उस समय हत प्रभ रह गये जब दस कन्धर रावण ने अपने दसों
मुखों से मन्त्रोचार शुरु किया ! उसके दसो मुखों से एक साथ निकली वेद मन्त्रों की
गुंज पुरे ब्रह्मांड मे गुंजने लगी ! आज से पहले ऐसा कभी किसी ने भी देखा सुना नही था !
उस समय तीनों लोको मे वेद ध्वनि गुंजायमान हो ऊठी ! चारों तरफ़ दशानन की जय जय कार
होने लगी ! और मुक्तकन्ठ से सबने प्रसंशा करनी शुरू करदी !
भोले नाथ तो अपनी सुध बुध ही खो बैठे थे ! रावण के मन्त्रोचार ने उनको मोहित
कर लिया था ! इतना सम्मोहन तो भोले नाथ को तब भी नही होता था जब दशकन्धर
उनको शिव तांडव स्तोत्र सुनाया करता था !
लगता है आज रावण ने भोले नाथ को
अति प्रशन्न कर लिया था ! मुहुर्त सम्पन्न होते ही भोले नाथ ने दशानन से दक्षिणा
मे अपनी मन चाही चीज मांगने का निवेदन किया ! दशानन ने उनसे निवेदन किया कि
मेरे उपर आपकी असीम अनुकम्पा है ! और आपकी दया से मुझे जो कुछ भी चाहिये वो
सब आपने दे रखा है ! मुझे तो आप सिर्फ़ इस निमित कुछ भी भेंट दे दे ! पर साब वो
कहते हैं ना कि जैसे दुष्ट अपनी दुष्टता नही छोडता ऐसे ही सज्जन अपनी सज्जनता नही
छोडता ! और फ़िर शिव कोई ऐसे ही कोई ओघड दानी थोडे ही कहलाते हैं ?


महाराज दशानन के बार बार इन्कार करने पर भी भोलेनाथ ने जिद पकड ली
और कहा-- मेरे प्रिय रावण , मुझे मालूम है कि तू आज तीनो लोको मे सबसे ज्यादा
बलशाली और ऐश्वर्य शाली है ! पर तू कम से कम मेरी इज्जत का तो खयाल कर !
तूने आज पहली बार पुरोहित कर्म किया है और मुझे मालूम है कि इस संसार मे
तुमसे पुरोहित कर्म का पूछने की भी किसी की हिम्मत नही है ! करवाना तो दूर की बात है !
और तुमने अपने दशों मुखों से जो वेद मन्त्रों का उच्चारण करके मेरा मन मोह
लिया है ! तुमको आज अपनी मर्जी की वस्तू मांगनी ही पडेगी ! और इसे तुम मेरा
आदेश समझो और शर्माना मत जो तुम्हारे पास नही हो वो मांग लो ! आज मैं तुम्हारे
ऊपर पुर्ण प्रशन्न हूं !


भोले नाथ का इतना प्रेम और अनुग्रह देख कर दशानन मजबूर हो गया उस काम के
लिये ! जिस काम के लिये लोग उसको दोषी समझते हैं ! भोले नाथ का आदेश था कि
वो मांगना जो तुम्हारे पास नही हो ! अब रावण ने बोलना शुरु किया ---!
हे देवाधि देव महादेव ! मुझे आपने मेरी सामर्थ्य से भी ज्यादा दे रखा है ! और
प्रभु ऐसी कोई भी वस्तु नही है जो इस समय आपके प्रिय रावण के पास नही हो !
तथापि आपका आदेश शिरोधार्य इस लिये करता हूं कि आपके आदेश की अवहेलना
मेरे लिये म्रत्यु से भी बढ कर होगी ! और दशानन अपने आराध्य देव के आदेश
की अवहेलना करने वाला ना कहलाये ! इसलिये हे महादेव मेरे पास आपकी इस स्वर्ण
नगरी को छोडकर सब कुछ है ! अत: आप पुरोहित कर्म के बदले मे मुझे यह
स्वर्ण नगरी दे दिजिये !
भोले नाथ तो ओघड क्या महा ओघड दानी ठहरे , तुरन्त तथास्तु कह दिया ! पर माता
पार्वती सहित अन्य उपस्थित लोग हत प्रभ रह गये और लक्षमी जी मुस्करा दी ! (क्रमश:)


मग्गाबाबा का प्रणाम !

5 comments:

  Udan Tashtari

23 August 2008 at 01:19

धन्य होगे दशानन की कथा सुन कर!! जय हो मग्गा बाबा की!! अगली कड़ी का बेसब्री से इन्तजार रहेगा.

  mahabharat

23 August 2008 at 08:40

आपकी कथा बड़ी सुरुचिपूर्ण और जानकारियों
से गुजरती हुई आगे बढ़ रही है | इतना आनंद
आ रहा है की क्या बताएं ? रावण के बारे में
भी आपने एक नई दृष्टि रखी है ! आज आपने
कथा को फ़िर एक रोचक मोड़ पर लाकर छोड़
दिया है ! आगे की घटनाओं के बारें में आपने
उत्सुकता बढ़ा दी है ! घटनाओं का ताना बाना
बहुत शानदार बुना गया है ! बाबाजी को
प्रणाम ! कथा चालु रखियेगा !

  राज भाटिय़ा

23 August 2008 at 11:48

राम राम मग्गा बाबा जी की, आप की कथा हम रोजाना पढते हे, बाबाजी लगता हे, शिव महाराज अब सबक सीखने की जुगाड मे हे इन देवताओ को, धन्य हो हमारे मग्गा बाबा ,बहुत ही अच्छी कथा चल रही हे, ओर आप के लिखने का ढग भी बहुत अच्छा हे, अगली कडी का इन्त्जार

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

23 August 2008 at 19:00

मग्गा बाबा की जय हो!
इतना तो पता लग गया कि सोने की लंका रावण को कैसे मिली. आगे क्या हुआ यह जानने की उत्सुकता है.

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

23 August 2008 at 19:00

मग्गा बाबा की जय हो!
इतना तो पता लग गया कि सोने की लंका रावण को कैसे मिली. आगे क्या हुआ यह जानने की उत्सुकता है.

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