माता पार्वती ने ख़ुद ही जलाई कुटिया

सुबह ही सुबह भोलेनाथ शनिदेव के यहां जाने को तैयार हो रहे थे ! अचानक
माता पार्वती बोली - भोलेनाथ आप जा तो रहे हैं पर मुझे अभी भी ऐसा लग रहा है
कि कुछ गडबड ना हो जाये !
भोलेनाथ बोले - उमा, तुम नाहक चिन्ता कर रही हो ! यकिन करो ! शनि मेरा अच्छा
शिष्य ही नही बल्कि मेरा भक्त भी है ! मैं गया और उसको बोल कर वापस आया !
माता पार्वती बोली - भोलेनाथ वह तो ठीक है ! सारी दुनियां ही आपकी भक्त है !
पर इससे क्या होता है ? अगर शनि देव नही माना और उसने हमारी कुटिया जलादी
तो हम दुनियां को क्या मूंह दिखायेंगे ? पूरी दुनिया के सामने हमारी थू थू नही
हो जायेगी ! लोग क्या कहेंगे ? भोलेनाथ की कुटिया एक छोटे से शनिदेव ने जला दी ?

नही नही भोलेनाथ ! ऐसे नही चलेगा ! कुछ पक्का उपाय करिये ! और दोनो मे विचार
विमर्श होने लगा !

आखिर भोलेनाथ के दिमाग मे एक उपाय आ ही गया , जिस पर माता पार्वती भी सहमत
हो ही गई ! अब भोलेनाथ बोले - उमा मैं जाकर शनि को समझाता हूं ! अगर वो मान
गया तो ठीक है ! और अगर नही माना तो हम उसके द्वारा अपनी कुटिया जलवाने के
बजाय खुद ही कुटिया को जला लेंगे ! जिससे दुनियां ये ही समझेगी कि कोई दुर्घटना
मे कुटिया जल गई !
माता पार्वती - पर ये कैसे होगा ? आप वहां से आवोगे, उसके पहले ही कहीं शनि
ने कुटिया का राम नाम सत्य कर दिया तो ?

ये भी विचार्णिय प्रशन था ! सोच विचार कर भोलेनाथ ने कहा - ठीक है ! ऐसा
करेंगे कि अगर शनि मान गया तो ठीक है और नही माना तो मैं तुम्हारे को सन्केत
के लिये मेरा डमरू बजा दुन्गा ! अगर तुमको मेरे डमरू बजाने की आवाज आये तो
समझ लेना कि शनि नही माना है और तुम तो घासलेट - दियासलाई तैयार ही रखना !
और डमरू की आवाज सुनते ही माचिस दिखा देना कुटिया को ! माता पार्वती को ये आइडिया
बिल्कुल जंच गया !

भोलेनाथ तो रवाना हो गये अपने नंदी के साथ ! और पहुंच गये शनि देव के पास !
शनिदेव ने जैसे ही भोले नाथ को आते देखा ! वो किसी अन्होनी के दर से कांप उठे !
ये तो ऐसे ही था जैसे कलेक्टर साहब किसी तहसीलदार के घर पहुंच जाये ! शनि देव
ऊठ कर दौडे और बाहर ही जाकर भोले नाथ के चरणों मे सर रख कर प्रणाम किया !
और सविनय बोले - प्रभु आपने कैसे कष्ट किया ? आदेश किजिये !

भोले नाथ ने सब बात बताई ! और यह सुनते ही शनि देव हंसते हुये बोले - हे शिव,
हे भोले भन्डारी ! आप समस्त जगत के नियन्ता हो ! प्रभु ये सारा जगत आपके
इशारे मात्र से गतिमान होता है ! आप कैसी बात करते हैं ! ऐसा कभी हो सकता
है कि आपका घर और मेरे जैसा कोई क्षुद्र ग्रह जला दे ? प्रभु आप मुझे इतना तो
अधम मत समझिये ! और इस तरह शनिदेव ने भोले बाबा की विनती करते हुये अनेक
प्रकार से उनकी स्तुति की ! और उनको आदर सत्कार करके अन्दर आसन पर बैठा दिया !

अब भोलेनाथ तो अति प्रशन्न हो गये और अपनी आदत के मुताबिक शनीदेव से कहा कि
शनिदेव मैं आपसे अति प्रशन्न हूं ! आप कोई भी इच्छित वरदान मांग लिजिये !
दशानन रावण ने तो फ़िर भी कुछ ना नुकुर के बाद महल मांगा था ! पर शनिदेव
की औकात कहां थी रावण के सामने ! कहां रावण और कहा शनिदेव ! शनिदेव की
तो क्या दुर्गति रावण ने कर रखी थी ये कभी बाद मे अलग से आपको बतायेंगे !
बस शनि महाराज खींसे निपोरते बोले - हे त्रिपुरारि शिव ! आपका दिया सब
कुछ है मेरे पास ! हे देवाधिदेव महादेव ! मेरी एक ही इच्छा जन्मों से है और वो
इच्छा कभी पूरी होगी , ऐसी मेरि औकात भी आपके सामने नही है ! पर आज आप
मेरे उपर प्रशन्न ही हैं तो मुझे आपका तान्डव न्रत्य देखने की इच्छा है !

हे जगदिश्वर ! अगर आप मुझ पर प्रशन्न हैं तो मुझे ये शौभाग्य प्रदान किजिये !
और मुझे अपना तान्डव न्रत्य दिखाईये ! अब भोले नाथ शनिदेव की इन प्रार्थनाओं से
प्रशन्न तो थे ही और भूल गये की पार्वती जी को क्या कह के आये थे ? और अपना
डमरू ऊठाके बजाते हुये तान्डव न्रत्य करने लगे !

और उधर जैसे ही माता पार्वती ने
डमरू की ध्वनि सुनी , वैसे ही उन्होने समझ लिया कि शनि देव ने बात नही मानी ! और
शनिदेव की सात पुश्तों को गालियां देती हुई बोल ऊठी - तेरा नाश मिटे, सत्यानाशी शनी !
तेरे से ये घास फ़ूस की झोंपडी भी सहन नही हुई ! अरे तू क्या जलायेगा हमारी कुटिया !
ले हम खुद ही जला लेते हैं अपना आशियाना ! और माता ने दियासलाई जलाकर कुटिया
को जला डाला !
सारी कुटिया घास फ़ूस की तो थी हि ! देखते २ धू धू कर जल ऊठी !

उधर भोले नाथ शनिदेव का आतिथ्य ग्रहण करने के बाद शाम को वापस कैलाश आये तो
देख कर दंग रह गये ! और सारा माजरा समझ कर मुसकरा ऊठे ! और जब सारी बात
माता पार्वती को पता चली तो वे भी मुसकरा ऊठी ! और दोनो ने इस पुरे वाकये का
बहुत दिनों तक एक दुसरे कॊ छेड छेड कर मुसकराते २ आनन्द लिया !

भोले ने कहा - उमा कोई भी हो ! होनी तो होकर रहती है !
माता मुसकराअते हुये बोली - हां भोले नाथ ! और ये हमारे साथ कुछ ज्यादा ही होती है !

इस पूरी कहानी से हमको सबक मिलता है कि --

जीवन मे कुछ बाते ऐसी होती हैं, जिनका कोई भी सिरा हमारे हाथ मे नही होता है !
फ़िर भी हम उनकी चिन्ताओं मे डुबे रहते हैं ! इतने दिन की चर्चा मे हमने देखा
की जगत के नियन्ता को भी नियति के हाथों ही चलना पडता है ! ये अलग विषय
होगा कि वो अपनी मर्जी से चलते हैं या चलना पडता है ! मेरा कहना है कि
हमको भोलेनाथ कि तरह हर परिस्थिति को सन्यत होकर देखना चाहिये ! और उसका
मुकाबला करना चाहिये ! सफ़लता मिलेगी ही यह जरुरी नही है ! यहां भोलेनाथ
का प्रसन्ग ऊठाने से भी यही मन्तव्य था कि जब भोलेनाथ भी हार सकते हैं , और
बडी राजी खुशी हन्सते हुये स्वीकार कर सकते हैं तो हम क्युं नही कर सकते ?

हम अपना पुर्ण प्रयत्न करें ! जैसे भोलेनाथ ने छोटे बडे की पर्वाह करे बगैर शनि
के घर चले गये ! क्या हम मे से कोई भी इस तरह अपने से छोटे आदमी के घर जा सकता है ?
शायद जवाब आयेगा नही ! क्युं कि हम जानते ही नही हैं कि क्या कर रहे हैं ?
इस जगत मे कोई छोटा बडा नही है ! और मैने तो देखा है आप जितने छोटे बन कर
जियेंगे आपका जीवन उतना ही सुन्दर होता जायेगा ! उतार फ़ेंकिये व्यर्थ का ढकोसला
और एक स्व्छन्द जीवन जीकर तो देखिये ! जो अपने हाथ मे नही है उसके क्युं पिछे भागते हैं !
और इस जगत मे आज भी बहुत कुछ आपके हाथ मे नही है !


यहां आप दो घटनाओं पर गौर करिये --

१) रावण भोलेनाथ का महल ले गया ! चाहे जैसे भी ले लिया हो !
२) शनिदेव ने कुटिया जलादी चाहे जैसे भी जलाई हो !


अब यहां दोनो घट्नाओं के बाद भी भोलेनाथ प्रशन्न हैं ! अगर भोले नाथ की जगह
आप होते तो क्या होता ? और आप क्या करते ? आप आत्म विशलेषण किजिये !
आपको स्वत: ही जवाब मिल जायेगा !

इस कथा को यहीं कुछ समय के लिए विराम देते हैं ! आप सबका शामिल होने
के लिए धन्यवाद ! फ़िर कुछ समय पश्चात कोई नया विषय देखकर शुरू करेंगे !
तब तक के लिए मग्गा बाबा का प्रणाम !

11 comments:

  अशोक पाण्डेय

28 August 2008 at 21:55

जय हो भोले भंडारी की।
जय हो मग्‍गा बाबा की।

  Udan Tashtari

28 August 2008 at 21:55

जय हो मग्गा बाबा की. आनन्द आ गया कथा सुनकर.आत्म विश्लेषण कर रहा हूँ-फिर आऊँगा बताने.

  अशोक पाण्डेय

28 August 2008 at 21:55

जय हो भोले भंडारी की।
जय हो मग्‍गा बाबा की।

  राज भाटिय़ा

28 August 2008 at 22:13

मग्गा बाबा आप सच मे धन्य हे, सच हे होनी तो हो कर ही रहे गी, कोई नही रोक सकता होनी को, लेकिन बाबा बहुत से लोग हे इस दुनिया मे जो छोटे ओर बडे का भेद नही करते, ओर ऎसे लोग बही हे जो पहले खुद छोटे रह चुके हो, ओर पेसा पाने के बाद अपनी गरीबी नही भुले, ओर जो अपनॊ ओकात भुल जाये वो इंसान नही .
धन्यवाद, इस सुन्दर सीख भरी कहानी के लिये, इसी खूशी मे आज ताई से दो लठ्ठ खा लो

  Bhairav

28 August 2008 at 23:08

मग्गाबाबा प्रणाम ! बहुत शांत शांत मन को लग रहा है ! दिल को बहुत शकुन मिला है ! यों लग रहा है जैसे किसी शांत और निर्मल झरने के पास बैठे हैं ! आपकी कथा पढ़ पढ़ कर एक अजीब आनंद दाई चैन महसूस हुवा है ?
ये क्या है है ! आज मन पहली बार इतना शांत क्यूँ है ? अगर आप चाहे तो जवाब दीजियेगा ! आपके आदेश अनुसार हमने कथा के पुरे सत्र में कुछ भी नही पूछा है !
आज समापन हुवा है ! अत: कुछ प्रशन हैं ! आप कहे तो मेल कर दे ! या आप चाहे तो सार्वजनिक तौर पर दे !
हम में से किसी ने भी आपके आदेश के मुताबिक कुछ भी प्रसन नही किया है ! अब आपकी मर्जी !

  mahabharat

28 August 2008 at 23:18

मग्गाबाबा की जय हो ! बाबाजी आज तो हमको
आनंद ही आनंद आ गए ! आज मन बहुत हल्का
हल्का हो गया है ! ये कथा पढ़ कर मानो सर का
बोझ उतर गया है ! सही में इतनी हाय धाय हम
क्यों कर रहे हैं ? आज तक समझ नही आया !
बाबाजी एक बात बताइये की अगर हम कुछ चिंता
ना करे तो उस स्थिति में अपने कार्य को कैसे कर
पायेंगे ?
अब भोलेनाथ तो परम योगी हैं ! अगर हमको ज़रा
सा भी काम रहता है तो उसके सिवाय कुछ भी सोचने
में नही आता ! मैं अपने शब्दों को व्यक्त नही कर पा
रहा हूँ ! आप अगर समझ रहे हों तो कृपया समझाने
की कृपा करे !

  दीपक तिवारी

28 August 2008 at 23:21

मग्गाबाबा को तिवारी साहब का प्रणाम ! बाबा
आपकी संगत में शायद हम भी सुधर जाए !
इमानदारी से हमको मजा आता है आपकी
कहानियों में ! आप अगली कथा जल्दी ही शुरू
करिए ! यही प्रार्थना है !

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

29 August 2008 at 06:56

अति सुंदर! एक प्रवचन में इतनी सारी शिक्षा!
मग्‍गा बाबा की जय!

  seema gupta

29 August 2008 at 11:59

" Read this blog first time, very peace ful place it is, i have enjoyed reading this article and really feeling a kind of peace in my soul" will wiat for your next....post

Regards

  GIRISH BILLORE MUKUL

29 August 2008 at 18:34

न करूं टिप्पणी तो पोस्ट से
लेखक से दुराग्रह होगा

  अनूप शुक्ल

14 September 2008 at 19:55

मग्गा बाबा की जय हो!

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