नारद जी के कैलाश से चले जाने के बाद फ़िर से माहौल काफ़ी तनाव भरा दिखाई
दे रहा था ! माता पार्वती के चेहरे पर एक दैविय के बजाए आम स्त्री सुलभ चिन्ता
की रेखाएं साफ़ देखी जा सकती थी ! और भोले नाथ अपनी चिलम के कश खींचने
में तल्लीन थे ! कहीं कोई असामान्यता नही दिखाई दे रही है !
माता पार्वती भोलेनाथ के पास आकर बैठ गई हैं ! और उन्होने भोले बाबा
से पूछा - ये नारद जी जब भी आते हैं हमेशा कुछ ना कुछ उल्टा पुल्टा ही होता है !
अब ये क्या शनि की दशम दृष्टि की बात कर रहे हैं ? अरे अगर शनिदेव की
दृष्टि मे दोष है तो वो अपनी आंखो का इलाज करवाएं ! हमसे और इस कुटिया
से उनको क्या लेना देना ?
भोले नाथ बोले - उमा, तुम सही कहती हो ! पर होनी को कौन टाल सका है ?
अभी तुमने स्वर्ण महल का हश्र देख ही लिया है ! और अब नारद जी भी प्रकान्ड
ज्योतिषी हैं सो मुझे भी कुछ गड्बड तो लग रही है !
अब दोनो इसी विचार विमर्श मे लगे हैं कि इस समस्या से कैसे निजात पाई जाए !
माता पार्वती बोली - हे भोले नाथ ये आपकी बे-इज्जती होगी, अगर शनिदेव ने हमारी
कुटिया जला दी ! ठीक है महल की वजह से हमारी जग हंसाई हुई है ! आप देख
नही रहे थे कि लक्ष्मी जी कैसे कैसे मंद मंद मुस्करा कर मजे ले रही थी ?
पर हमारा महल था ! हमने अपनी मर्जी से दशानन को दे दिया इसमे कोई परेशानी नही है !
पर अगर शनि महाराज ने आपकी कुटिया जला दी तो, आप समझ लिजिये मैं सहन
नही कर पाऊंगी ! भोले नाथ ने भी सोचा ये अजीब आफ़त नारद मुनि खडी कर गये !
और हमने भी सोचा कि अब मामला वास्तव मे गंभीर है ! हम जो सोच रहे थे
कि नारद जी ने कोई दुश्मनी निकाली है शनिदेव से , वो वाली बात नही है !
माता पार्वती उठ कर शाम का भोजन प्रबन्ध करने जाने की सोच रही थी , क्योंकि
आज ही उनके परम लाडले सुपुत्र गणेश ने फ़र्माइश की थी लड्डुओं के लिये !
और गणेश का लड्डु प्रेम ऐसा कि २/३ सौ लड्डु खाए बगैर उनको कहां आराम ?
माता को इस कार्य मे भी लगना था ! पर पता नही आज माता की इच्छा नही
हो रही थी किचन मे जाने की ! अन्यथा गणेश की फ़र्माइश आने के पहले लड्डु
तैयार हो जाया करते थे ! माता गणेश की इच्छा का इतना ख्याल रखती हैं ! वैसे
भी कैलाश पर किसी की भी लड्डु खाने की इच्छा होती तो वो बालक गणेश को
लड्डुओ की याद दिला देता ! और बहाना तो गणेश के लिये लड्डू बनाने का होता !
और पूरे कैलाश पर सबको लड्डु खाने को मिल जाते ! और खाने वालों मे पूरा
भोले का परिवार ! भैरव, नन्दी, भूत , प्रेत और चुडैल सब की चकाचक मस्ती
रहती ! इसीलिये तो माता पार्वती को अन्नपूर्णा भी कहते हैं ! और एकाध लड्डू
नही , सबको भर पेट !
और ये सारे कैलाश वाशी भी बडी तल्लीनता और ह्रदय
से माता के साथ सम्पुर्ण कार्य मे हाथ बंटाते ! सारा सामान माता के आदेश
करने के पहले ही ये सारे गण लोग तुरन्त जुटा देते थे ! और माता के हाथ के
लड्डू का स्वाद तो क्या कहने ! हम भी तो गणेश जी के नाम से प्रसाद चढाने
का कह कर अपना लड्डू प्रेम पूरा करते हैं ! और अब गणेश उत्सव मे तो रोज ही
मां के हाथ के बने लड्डू हमको भी मिलने वाले हैं ! ये तो माता पार्वती ने
अपने सारे गणेशों ( हम सारे ही तो माता पार्वती के गणेश ही हैं ) को लगातार
दस दिन लड्डू खिलाने को इस उत्सव की शुरुआत की होगी !
अचानक भोले नाथ प्रशन्नता से चिल्लाते से बोले - उमा, उमा सुनो !
मेरी बात सुनॊ ! माता बोल उठी - क्यों ? क्यों इतना चिल्ला रहे हो ?
क्या हो गया ऐसा ?
शिव बोले - उमा ! मैं अभी समस्या पर मनन कर ही रहा था कि मुझे ध्यान आया
की शनिदेव तो मेरे प्रिय शिष्य हैं और अगर मैं उनको कह दूं कि भैया तू इस
कुटिया से तेरी नजर हटा ले तो वो बिल्कुल मान जायेगा !
अब भोलेनाथ को कौन समझाये की ये उनके प्रिय शिष्य ही उनको परेशानी
मे डालते हैं ! अभी अभी तो रावण, उनका प्रिय शिष्य उनको सबक देकर गया है !
और अब भोले बाबा शनिदेव को प्रिय शिष्य बताने लग गए हैं !
तो माता बोली - ठीक है ! इसमे क्या बुराई है ! बुलाओ शनिदेव को !
और समझा दो उनको कि यहां से नजर हटा ले !
भोलेनाथ ने कहा - देखो देवी ! काम हमारा है, और जाना हमको चाहिये !
मां पार्वती - बात ठीक तो है ! पर आपका वहां जाना अच्छा लगेगा क्या ?
( बात भी सही है ! बराबरी वाले अफ़सर से ही आने जाने का व्यवहार होता है !
अरे कलेक्टर साहब को काम है तो वो तहसीलदार के घर थोडे ही जायेगा ! वहीं
अपने घर बुला कर उसकी ऐसी तैसी नही कर देगा ? )
पर शिव इसी लिये तो शिव हैं कि उनकी नजर मे कोई छोटा बडा नही है ! सब जीव
एक समान हैं ! अत: उन्होने कहा कि इसमे कोई हर्ज नही हैं ! मैं चला जाता हुं !
माता पार्वती बोली - आप एक काम करो ! शनि महाराज को मोबाइल से बात
करके समझा दो !
भोले ने कहा - देखो ये शनि देव की दृष्टि का सवाल है ! वहां गये
बगैर काम होगा नही ! और मेरे पास उनका नया नम्बर भी नही हई !
( असल मे माता को ऐसा लग रहा था कि भोलेनाथ को शनिदेव किसी बात मे फ़ंसा
लेंगे और हमेशा की तरह वोही ढाक के तीन पात होंगे ! हर दुनियां की स्त्री
समझती है कि उसके पति से ज्यादा भोला और शरीफ़ कोई नही है ! पर वो वाकई होता
नही है ! और इसको तो आपसे अच्छी तरह कौन समझ सकता है ! आप को आपकी
धर्मपत्नि जितना शरीफ़ समझती हैं उतना आप हैं क्या ? )
अब माता मान तो गई कि सुबह आप चले जाना ! पर फ़िर एक सवाल ......?
(क्रमश:)
( अगली समापन किश्त होगी ! पोस्ट के विस्तार भय से एक किश्त और )
मग्गाबाबा का प्रणाम !
भोलेनाथ का शनिदेव से मिलने का विचार
Wednesday, 27 August 2008 at Wednesday, August 27, 2008 Posted by मग्गा बाबा
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13 comments:
27 August 2008 19:03
मग्गा बाबा की जय
27 August 2008 19:04
मग्गा बाबा की जय
27 August 2008 19:30
badhiya prasang.agali kadi ki pratiksha me .thanks
27 August 2008 19:55
आपकी जय हो मग्गा बाबा। सिर्फ कथा ही सुनाएंगे, दर्शन कब देंगे :)
27 August 2008 20:41
.अब तो भोला भँडारी
और माता पार्बती की
२१ वीँ सदी मेँ जयजयकार गूँजेगी
- भला किया
यहाँ उनकी कथा रख कर ..
जारी रखिये ...
- लावण्या
27 August 2008 20:44
बाबाजी प्रणाम , ये शनिदेव तो किसी को भी नही छोड़ते !
अब ये भोलेनाथ जी के साथ क्या करेंगे ? आपने बड़ी
रोचक कहानी को जारी रखा है ! हमको भी एक बार
शनिदेव ने पकड़ लिया था तो हमको भी बहुत पटक पटक
के मारा था | देखते हैं भोले बाबा के साथ क्या करते हैं !
27 August 2008 20:48
मग्गा बाबा की जय!!!
27 August 2008 21:03
दुनियां की हर स्त्री समझती है कि उसके पति से
ज्यादा भोला और शरीफ़ कोई नही है !
बाबाजी आपने बड़ी उंची बात कह दी ! इसी मानसिकता की
वजह से तो स्त्री को ये पुरूष बेवकूफ बनाते हैं ! पर शुक्र है
हमारे भोले नाथ ऐसे नही हैं ! माता पार्वती को पूरा सम्मान
देते हैं ! औत उनकी पुरी इज्जत करते हैं ! बाबाजी कभी
दर्शन भी दे दीजिये ! प्रणाम मग्गा बाबाजी को !
27 August 2008 21:06
बाबाजी कथा में आनंद आ रहा है !
अनवरत चलती रहे ! यही प्रार्थना है !
मग्गाबाबा के चरणों में प्रणाम !
27 August 2008 21:16
अब भोलेनाथ को कौन समझाये की ये उनके प्रिय शिष्य ही उनको परेशानी मे डालते हैं ! अभी अभी तो रावण, उनका प्रिय शिष्य उनको सबक देकर गया है ! और अब भोले बाबा शनिदेव को प्रिय शिष्य बताने लग गए हैं !
बाबाजी को फ़न्डेबाज का सादर प्रणाम ! बाबाजी आपका उपरोक्त कथन आज भी उतना ही सही है जितना उस समय में रहा होगा ! इसी से लगता है की आप बिल्कुल आधुनिक और वैज्ञानिक संत हैं ! संतो की भी ऎसी ही द्रष्टि होनी चाहिए ! बाबाजी आप अच्छी सीख दे रहे हैं ! प्रणाम बाबा जी !
27 August 2008 22:23
जय मग्गा बाबा
28 August 2008 00:54
राम राम बाबा जी, बाबा जी आप की कथा तो बहुत ही रोचक होती जा रही हे,ओर मजा भी आ रहा हे,देखे आगे क्या क्या होता हे.
बाबा जी प्राणम
28 August 2008 07:57
मग्गा बाबा की जय!
स्त्री समझती है कि उसके पति से ज्यादा भोला और शरीफ़ कोई नही है!
अब भोले बाबा से भोला और कौन हो सकता है भला?
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