समय प्रबंधन के उत्क्रष्ठ उदाहरण !

प्रिय मित्रों , आज कुछ महाभारत से !
महादानी कर्ण का नित्य कर्म दान देना तो था ही पर उनके दान देने में एक
विशेषता और थी की याचक के माँगते ही तुंरत दान कर दिया करते थे !
ऐसे ही महाराज कर्ण एक रोज अपने नित्य नियमानुसार दान कर के उठ चुके थे !
और उनका एक प्रिय आभूषण जो की उतारकर रखा हुवा था उसको उन्होंने बांये हाथ
में उठा रखा था ! उसी समय एक याचक उपस्थित हो गया और दान देने की याचना की !
महाराज कर्ण ने पूछा-- आज्ञा करें ! याचक ने कहा-- आपका यह आभूषण प्राप्त करने
की अभिलाषा है ! महाराज कर्ण ने तुंरत अपने हाथ में जो आभूषण था वह याचक
को दे दिया ! तभी वहाँ उपस्थित किसी सज्जन ने महाराज कर्ण से कहा की आपने
बांये हाथ से दान दिया है ! जबकि दान देने का फल तो दाहिने हाथ से देने पर ही
मिलता है ! महाराज कर्ण ने कहा-- संभवतया आप ठीक कह रहे होंगे ! पर जो वास्तु
इस याचक ने मुझसे मांगी थी वो मुझे इतनी प्रिय थी की अगर मैं उसको बांये हाथ से
अपने दायें हाथ में देता तो मेरी नियत ख़राब हो सकती थी ! फ़िर शायद मैं मना कर
देता ! मैं अपने आपको इतना भी समय सोचने का इस मामले में नही देना चाहता था !

ये प्रसंग भी महाभारत से है और दूसरा भी देखिए महाभारत से ही !

दूसरा प्रसंग देखें महाराज युधिष्ठर का ! किस्सा अज्ञात वास के दिनों का है !
एक दिन सुबह सुबह की बात है ! एक याचक उनके पास आता है ! और उस
भिखमंगे ने उनसे कुछ भिक्षा मांगी ! अब आप जानते हैं की अज्ञातवास के
दिन कोई महाराज गिरी के तो थे नही की आदेश दे दिया और मंत्री ने काम
कर दिया ! वहाँ तो जो कुछ भी करना नही करना ख़ुद ही को पङता था !
उस समय महाराज युधिष्ठर चारपाई बुन रहे होंगे सो भिखमंगे
से बोले -- यार भाई एक काम कर ! तू कल आना और कल आ कर ले जाना !
अभी मैं ज़रा चारपाई बुन लूँ !

तो साहब दादा भीम को तो आप जानते ही हैं ! वैसे तो दादा बाहुबली भीमसेन जी
को सभी ने पेटू और बलशाली पहलवान ही घोषित कर रखा है ! और उनका पूरी
महाभारत में महिमा मंडन भी ऐसा ही है की जहाँ ताकत का काम पड़े दादा को
जोत लो और बुद्धि वाले कामों में उनकी सलाह भी मत लो !
खैर साब जैसे ही महाराज युधिष्ठर ने भिखमंगे को कल आने का कहा तो दादा भीम
तुंरत उठे और पास पडा नगाड़ा उठाया और जोर जोर से बजाते हुए बाहर की
तरफ़ भागे !
अब महाराज युधिष्ठर ने थोडा नाराज होते हुए भीम से पूछा - भाई भीम ये तू
चारपाई बुनवाना छोड़ कर, अचानक ढोल बजाता हुवा बाहर की तरफ़ भाग रहा है !
बात क्या है ? दादा भीमसेन जी बोले -- पूरे समाज को सूचना तो देनी पड़ेगी ना
की मेरे अग्रज ने समय को जीत लिया है ! और एक भिखमंगे को आश्वासन दिया है
की कल आकर भीख ले जाए जैसे आपको पक्का मालुम है की कल आयेगा ही !
ये तो सही में नगाडे बजाने जैसी ही बात है !
महाराज युधिष्ठर को तुंरत बात समझ आगई ! उनको लग गया की ये भी कोई
कोरा पहलवान ही नही है ! आख़िर तो भाई उनका ही था !
उठे और दौड़ कर उस भिखारी को पकडा और क्षमा याचना सहित भीख लेने के
लिए प्रार्थना की ! क्योंकि जो करना है वो अभी ! कल पर टालना तो तभी हो
सकता है जब हमको मालुम हो की कल पक्के से आयेगा ही ! और कल हम भी होंगे ?
हो सकता है कल तो आए पर हम ना हों !

वर्तमान में होने के दो अति सुन्दरतम उदाहरण हैं ये दोनों प्रसंग ! हम भी
अगर हमारे छोटे छोटे कार्यों को भी इस तरह व्यवस्थित रूप से करते चले
जाएँ और कल पर ना छोडे तो आप विश्वाश करें की इतना जबरदस्त बदलाव
हमारे दैनिक जीवन में आता है की आप कल्पना भी नही कर सकते !
जब कोई काम कल के लिए पेंडिंग नही है तो जीवन इतना हल्का लगने लगता है
की हम जीवन के सार को समझने लगते हैं ! क्योंकि हमारे ऊपर कोई दबाव
नही है काम का ! जब भी आपने देखा होगा की आप पर दबाव नही है उस समय
का आपका व्यवहार मित्रों , बच्चों , पत्नी, माँ-बाप और समाज के प्रति कितना
प्रेमपूर्ण रहा होगा ?

आप इस बार साप्ताहिक छुटियों में प्रयोग करके देखें ! एक शुक्रवार आप सब
काम निपटा कर घूमने जाए और अगले को कुछ काम पेंडिंग छोड़ जाए और
उस समय की तुलना करले आपको मेरी बात समझ आ जायेगी !
आपने पहले शुक्रवार अच्छा समय बिताया या दुसरे ?

हमारे शास्त्र तो एक समुन्दर की तरह हैं और आप जानते हैं की समुन्दर
में मूंगे मोती भी होते हैं और सर फोड़ने वाली चट्टाने भी ! आपकी मर्जी है
चाहे मूंगे मोती से अपना खजाना भर ले या चाहे तो चट्टानों से अपना सर फोड़ ले !
उपरोक्त दोनों प्रसंग समय प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण हैं !
मग्गा बाबा का प्रणाम !

5 comments:

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

10 August 2008 at 16:24

बहुत सुंदर प्रसंग बताये हैं आपने. मेरा दृढ़ विश्वास है कि समय को इज्ज़त न देने वाले लोग अंततः समय से मार खाते हैं.

"चाहे मूंगे मोती से अपना खजाना भर ले या चाहे तो चट्टानों से अपना सर फोड़ ले यह वाकया भी बहुत ही सच्चा है.

  अनूप शुक्ल

10 August 2008 at 19:13

सुन्दर। शानदार च जानदार!

  Udan Tashtari

10 August 2008 at 23:09

जबरदस्त!! मग्गा बाबा की जय!!!

  राज भाटिय़ा

11 August 2008 at 01:01

मग्गा बाबा मेने भी सोचा जो टिपण्णी कल देनी हे अभी दे दु,बहुत ही अच्छा लेख लिखा हे, ओर ग्याण भी भरपुर हे,मग्गा बाबा की जय,राम राम जी की

  sab kuch hanny- hanny

12 August 2008 at 13:09

sabse pahale to meri kavita ko pasand karne k liye dhanywad. samay prabandhan sikhana achchha laga. aise hi gud sikhate rahen

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