सत्य में अपार साहस होता है !

प्रिय मित्रों, कल आपसे मिलना नही हो सका ! खैर हम यहां मिलना ना
मिलना , इसको ईश्वर का पुर्व नियोजित खेल मान ले ! या जो भी मान लें !
जब हम रोज मिलने का कार्यक्रम बना लेते हैं तो यह भी एक अखरने वाली
सी बात हो जाती है ! मैं इतने सालों मे पहली बार बिना इन्टर नेट के
२० घन्टे तो गुजार चुका हूं ! और पता नही यह कब तक चालू होगा ?
पहली बार लग रहा है कि ये भी एक नशा हो गया है ! आज चुंकी नेट
बंद है तो किसी से भी बात तो हो नही पायेगी ! मैं एक बहुत पुरानी
किताब आज पढ रहा हूं ! और इस किताब मे मैने एक कहानी पढी है !
मुझे लगता है कि ये कहानी पढी तो आपने भी होगी पर फ़िर वही पहले
वाली सी बात ! नजरिया .. जी अपना अपना नजरिया... अब इसको मेरे
नजरिये से देखते हैं !

कहानी इस तरह है-- एक महान वैग्यानिक हुवा था
गैलीलियो ! और जब इसने ये सिद्ध कर दिया कि धरती चपटी नही गोल है !
तो कोहराम मच गया ! क्योंकी उस समय तक यही माना जाता रहा था कि
धरती चपटी है ! और चुंकी यह तथ्य बाइबल मे लिखा है कि धरती चपटी
है तो अगर गैलीलियो की सनक को माना जाये तो बाईबल गलत हो जायेगी !
और ये धर्म के ठेकेदारों को मन्जूर नही होता ! और ये बात सिर्फ़ ईसाइयत मे
ही नही बल्कि सभी धर्म के ठेकेदार इस मामले मे उन्नीस बीस एक जैसे ही हैं !
खैर हमको उस बहस मे नही पडना है ! गैलीलियो ने कहा-- धरती गोल है !
और सुरज नही बल्कि धरती , सुरज के चक्कर लगाती है ! ये तथ्य पोप को
बहुत बुरा लगा ! सोचिये आज से करीब सवा तीन सौ साल पहले का पोप का राज !

पोप के सामने गैलीलियो को हाजिर होने का आदेश दिया गया ! और नियत
समय पर उसे पोप के यहां हाजिर किया गया ! पोप ने उससे कहा-- तुमने
जो कुछ कहा है उसके लिये माफ़ी मांगो और कहो की धरती गोल नही
बल्कि चपटी है और सुरज ही धरती के चक्कर काटता है , धरती नही !
और इस समय तक सिद्ध हो चुका था कि धरती गोल है और सुरज
के चक्कर काटती है !

लेकिन जो जबाव गैलीलियो ने दिया वह जबाव सुनने
लायक है ! वो बोला- अगर आपको इसमे मजा आता है कि सुरज , धरती का
चक्कर लगाए और धरती गोल ना होकर चपटी ही रहे तो मुझे क्या अडचन है ?
मैं आपके मन मर्जी के शब्द कहे देता हूं ! मगर मेरे कहने से तथ्य नही बदल
जायेंगे ! धरती गोल है और सुरज के चक्कर काटती है तो मेरे माफ़ी मांगने से
यह बात बदल तो नही जायेगी ! मैं आपसे माफ़ी भी मांग लेता हूं ! मैं इस
बात की झन्झट मे पडना ही नही चाहता ! मैने घुटने टेके आपके सामने !
पर मैं व्यर्थ के विवाद मे पडना नही चाहता ! मेरे कथन के लिये माफ़ी मांग
लेता हूं पर मैं क्या करूं ? मेरे माफ़ी मांगने से कुछ होने वाला नही है !

क्या बात कही इस व्यक्ती ने ? कितना मस्त फ़कीराना आदमी रहा होगा ये
गैलीलियो ? बुढा हो चुका गैलीलियो !
इसके जबाव सुन कर तो मेरी
इच्छा हो रही है कि इस फ़क्कड फ़कीर वैग्यानिक के चरण छू लू !
क्योंकी ये व्यक्ति है ही इस काबिल ! ऐसा वकतव्य तो कोई मन्सूर मस्ताना
ही दे सकता है पोप के सामने ! हे मसीहा तुझे मग्गा बाबा के प्रणाम !

चलिये ये कहानी तो आप सब ने सुनी हुई है ! यहां सिर्फ़ दोहराव हो गया !
ये घटना अगर बाईबल से ना जुडी होती तो शायद मैं इसको यहां कहने
की जहमत ही नही उठाता ! पर एक महान धार्मिक ग्रंथ के लिये ये कहानी सिर्फ़
उदाहरण स्वरूप ही ली गई है ! क्या हमारे या अन्य धर्मों के धर्म शाश्त्रों
मे इस तरह की अनेक उल जलुल और ऐसी कहानियां नही है जो कि
अब तो बिल्कुल असामयिक हो चुकी हैं ! या आप भी मानेंगे कि समय
के साथ हर तथ्य का नवीनिकरण होता जाता है ! मेरी समझ से कोई
भी किताब शाश्वत नही हो सकती ! मैं यहां किसी भी धार्मिक पुस्तक का
नाम नही लूंगा पर हमको ग्यान को ग्यान के रुप मे स्वीकार करना पडेगा !
जब भी कोई गैलीलियो पैदा होगा वो पुरानी मान्यताओं को तोडेगा !
और मुझे तो गैलीलियो का अन्दाज पसन्द आया । हम किसी को बदल
तो नही सकते ! पर हम खुद को तो रोशन कर सकते हैं ! हमारा दिमाग
कोई कचरे का डिब्बा नही है कि कोई भी आये और हमारे दिमाग मे अपने
दिमाग का कचरा थूक कर चला जाये ! भले ही कोई भी ग्रन्थ क्यों ना हो !
और मित्रों किसी से उलझना भी क्यों और किसलिये ? सबके अपने अपने
नजरिये हैं ! और मैं तो कहता हूं कि अपनी समझ इतनी इमानदार हो कि
दुसरा हम पर हावी होने की सोच ही ना पाये ! हम भी गैलीलियो के अन्दाज
मे जीवन की समझ विकसित कर पायें !

मुझे नही पता कि अगला जीवन क्या होगा ? और कैसा होगा ? और होगा
भी या नही ? मैं तो यही कोशिश करता हूं कि जो आज है उसको जीने
की कोशिश करे तो आने वाले कल का जीना और सुन्दर हो जाता है !
जीवन बंधे बंधाये नियमों पर नही चलता ! जीवन तो जीने की कला है !
और कोई भी कला खरीदी नही जा सकती ! दुसरों को दुख मत दो !
खुद को भी नही मिलेंगे ! हंसना है तो खुद पर हंसो ! फ़िर देखो , दुसरों
को हंसता देख कर तुमको कितना शुकुन मिलेगा !


हमारा हर कार्य इतनी इमानदारी और सत्य से परिपुर्ण हो कि सामने
चाहे पोप हो या तोप हो , हम भी गैलीलियो के बेफ़िकरी वाले अन्दाज मे
जवाब दे सके ! इस तरह के जीवन की गुणवतता कुछ अलग ही होती
है और ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने आत्मविश्वास से ही पनपती है !

मग्गा बाबा का प्रणाम !

5 comments:

  राज भाटिय़ा

9 August 2008 at 01:04

मग्गा बाबा जी राम राम बाबा जी आप की बात बहुत ही अच्छी लगी,मेरा भी यही मनाना हे की हम भेड नही जो बिन सोचे समझे भीड के पीछे पीछे चले,अगर मुझे यकीन हे की मे सही हो तो मे कभी मुड कर नही देखता ओर चल पडता हू,अपनी राह,भीड का अंग नही बनता, बाबाजी सच बोलने का सब से बडा लाभ, कि हमे सोचना नही पडता की अब क्या बोलना हे कल क्या बोला था.
आप का लेख बहुत ही अच्छा लगा,धन्यवाद

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

9 August 2008 at 04:01

बहुत खूब - सत्य और साहस एक दूसरे के पूरक भी हैं और सहधर्मी भी.

तोप हो या पोप हो
या गर्दन में रोप हो
सच्चा तो डरता नहीं
सच्चा तो हटता नहीं.

  GIRISH BILLORE MUKUL

9 August 2008 at 22:23

vah baba jee
achhaa adbhut hai
ye link aapako
saadar
http://mukul2.blogspot.com/

  GIRISH BILLORE MUKUL

9 August 2008 at 22:25

aapake blag pe is abhyukti kee koi jaroorat hai......?
एक संन्यासी की मौज है ! कोई इच्छा नही ! कोई आकांक्षा नही !
shayad "Sanyaasi"likhanaa hee paryaapt hai

  मग्गा बाबा

10 August 2008 at 13:16

प्रिय मित्र मुकुल जी , आपकी जिज्ञासा के विषय में कहना चाहूँगा की ब्लॉग पर तीन लाइने लिखी हैं और वो मेरे परिचय के लिए नही हैं !
वो तीनों लाइने उस जलती हुई ज्योति के विषय में हैं ! इस ज्योति के अलावा संन्यासी की कोई मौज , इच्छा या आकांशा नही होती ! और
मुकुल जी ये सब सिम्बोलिक है ! इसे आप या मैं कुछ भी नाम देदे !
मैं तो अभी संन्यासी की अवस्था से बहुत दूर हूँ ! कुछ ठंडी हवाएं महसूस होना शुरू हुई ही हैं ! मैं भी एक सीधा सादा आम इंसान हूँ ! आप नाम पे ना जाए ! जैसे आप इस पथ के जिज्ञासु हैं वैसे ही मैं भी इस पथ पर अग्रसर हूँ ! हो सकता है एक दो क्लास का फर्क हो ! वैसे आगे पीछे सब पहुँच ही जाते हैं ! आख़िर हम कितने ही भटके
हुए हों हमारा गंतव्य तो एक ही है ! नदी आख़िर सागर में ही तो पहुँचने की जिद में कहीं कहीं इतना शोर कर बैठती है ! पर जैसे ही सागर पास आता जाता है यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है की
कहाँ नदी है और कहाँ सागर है ? सब एकाकार हो जाता है !
जैसे यात्रा में संगी साथी मिलते जाते है वैसे ही इस यात्रा में भी संगी साथी मिलते रहते हैं ! जैसे देखिये अभी आप मिल गए ! अच्छा है साथ साथ चलते चलते थोडा रास्ता सुगमता से कट जायेगा !
फ़िर जैसे जैसे मंजिल आती जाती है सब बिछुड़ने लगते हैं ! और फ़िर कभी शायद मिलते भी नही हैं ! पर कुछ रास्ते के संगी साथी ऐसे भी मिल जाते हैं की उनसे आत्मीयता बनी रहती है ! सब अपने पूर्व कर्मों का लेखा जोखा है !
आपका शुक्रिया !

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